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खामोशी से रोशनी छीन रहा ‘ग्लूकोमा’: 40 की उम्र पार हर 100 में 3 लोग चपेट में, IGIMS में रोज पहुंच रहे दर्जनों मरीज

आंखों की रोशनी जा रही है, लेकिन न दर्द हो रहा है और न ही इसके स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। ग्लूकोमा यानी काला मोतिया इसी खामोशी में आंखों की आप्टिक नर्व को क्षतिग्रस्त कर हमेशा के लिए रोशनी छीन लेता है। देश व प्रदेश में हर सौ में करीब तीन लोग इसकी चपेट में हैं और दुनिया के कुल ग्लूकोमा रोगियों के 20 प्रतिशत भारत में हैं।

2050 तक देश में 40 वर्ष से अधिक उम्र के 4.5 प्रतिशत लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं। सबसे चिंताजनक यह है कि करीब 90 प्रतिशत रोगियों को इसके होने का पता ही नहीं चलता। जब तक वे जांच कराने पहुंचते हैं तब तक आंखों की रोशनी का बड़ा हिस्सा जा चुका होता है।

एक बार जा चुकी रोशनी वापस लाना संभव नहीं

ग्लूकोमा से एक बार जा चुकी रोशनी वापस लाना संभव नहीं, लेकिन समय पर पहचान और नियमित उपचार से बची हुई दृष्टि को सुरक्षित रखा जा सकता है। ऐसे में आंखों के ठीक दिखने का भरोसा नहीं, नियमित जांच ही बचाव का आधार है।

बीपी-शुगर व हृदय रोग की तरह इसका उपचार भी ताउम्र चलता है लेकिन अधिसंख्य रोगी फायदा दिखते ही दवा व फालोअप छोड़ देते हैं। राष्ट्रीय अंधत्व सर्वेक्षण में 50 वर्ष से अधिक उम्र के अंधेपन के शिकार हुए 5.5 प्रतिशत का कारण ग्लूकोमा पाया गया।

जैसे-जैसे बढ़ती उम्र, बढ़ता जाता खतरा

ग्लूकोमा सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डा. सत्यन पार्थसारथी ने बताया कि वर्तमान में देश में 1.2 करोड़ लोग इससे पीड़ित हैं। देश में 40 वर्ष से अधिक उम्र के 3.23 प्रतिशत यानी हर सौ में करीब तीन लोगों को ग्लूकोमा होने की आशंका है। वहीं, 60 वर्ष से अधिक उम्र में यह प्रति सौ लोगों में से पांच से छह लोगों तो 80 वर्ष के बाद 10 से 12 लोगों को हो सकता है। देश में अंधेपन का यह तीसरा प्रमुख कारण हैं।

5.5 प्रतिशत लोग इसके कारण अंधेपन की चपेट में आए हैं। वर्तमान में करीब 1.5 लाख लोग ग्लूकोमा के कारण दोनों आंखों की रोशनी गंवा चुके हैं। 2050 तक ग्लूकोमा का प्रसार बढ़कर 4.52 प्रतिशत तक होने की आशंका है। यह संख्या तब है, जबकि 90 प्रतिशत मरीजों को रोग का पता ही नहीं चल पाता।

आइजीआइएमएस में हर दिन 50 से अधिक मरीज

आइजीआइएमएस स्थित क्षेत्रीय चक्षु संस्थान के प्रमुख प्रो. डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा ने बताया कि ओपीडी में प्रतिदिन ग्लूकोमा के 50 से अधिक मरीज उपचार कराने आते हैं। इनमें 12 से 13 मरीज नए होते हैं। इनमें से पांच ऐसे होते हैं जिनकी आंखों की 90 प्रतिशत तक रोशनी जा चुकी होती है। वहीं, राजेंद्र नगर विशिष्ट नेत्र अस्पताल के निदेशक डा. अजीत द्विवेदी ने बताया कि उनके अस्पताल में हर दिन 15 से 20 मरीज आते हैं। इसके अलावा कई मरीज ऐसे आते हैं, जिनमें ग्लूकोमा की आशंका होती है लेकिन उसकी पुष्टि उस समय तक पूरी तरह से नहीं हुई होती है।

ग्लूकोमा के प्रमुख कारण

  • आनुवंशिक यानी परिवार में किसी को है तो सबसे अधिक खतरा, कई बार मां से नवजात तक को हो सकता है।
  • मधुमेह, ब्लड प्रेशर व आंख में पुरानी चोट जैसे कारणों से भी हो सकता है।
  • बिना चिकित्सकीय सलाह के स्टेरायड आइ ड्राप या अन्य स्टेरायड दवाओं के प्रयोग से आंख का प्रेशर बढ़ने से।

इन लक्षणों को लें गंभीरता से

धीरे-धीरे किनारे की दृष्टि कम होने, चीजों से टकराने या देखने का क्षेत्र संकरा होने जैसी समस्या होती है। कुछ प्रकार के ग्लूकोमा जिनमें अचानक आंख का दबाव बढ़ता है, तेज आंख दर्द, आंख लाल होना, लगातार आंखों से पानी आना, धुंधला दिखाई देना, रोशनी के चारों ओर इंद्रधनुषी घेरे, सिरदर्द, मिचली-उल्टी जैसे लक्षण हो सकते हैं।

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