बिहार-झारखंड
पितृपक्ष 2026: 1000 फीट ऊंचे पर्वत पर सत्तू उड़ानों की अनोखी परंपरा, अकाल मृत्यु वाले पितरों को मिलती है शांति
पितृपक्ष में गयाजी आने वाले पिंडदानियों के लिए प्रेतशिला पर्वत की यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल तक पहुंचना नहीं, बल्कि पितरों की मुक्ति की कामना से जुड़ी आस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। गयाजी से करीब 10 किलोमीटर दूर लगभग एक हजार फीट ऊंचे प्रेतशिला पर्वत पर स्थित प्रेतशिला वेदी को खास तौर पर अकाल मृत्यु को प्राप्त स्वजनों के निमित्त पिंडदान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
25 सितंबर से शुरू होने वाले पितृपक्ष मेला में देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचेंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार आत्महत्या, दुर्घटना, फांसी या विष सेवन जैसी असामयिक मृत्यु को प्राप्त पितरों की शांति के लिए यहां पिंडदान और तर्पण किया जाता है।
प्रेतशिला में सत्तू से पिंड बनाने और बाद में सत्तू उड़ाने की भी अनोखी परंपरा है। इसे पितरों की मुक्ति और प्रेतबाधा निवारण का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु पहले ब्रह्मसरोवर में स्नान और तर्पण करते हैं, फिर पहाड़ी की सीढ़ियां चढ़कर वेदी तक पहुंचते हैं।
बुजुर्ग और असमर्थ तीर्थयात्रियों के लिए डोली-खटोली सहारा बनती है। रोपवे का निर्माण अभी पूरा नहीं होने के कारण इस बार भी श्रद्धालुओं को सीढ़ियों या डोली-खटोली से ही वेदी तक पहुंचना होगा।
तीन प्रेतराज, ब्रह्मा के चरणचिह्न और प्रेतशिला की पौराणिक मान्यता
गयाजी गजाधर धामी पांडा समिति के सदस्य शिवा कुमार पांडे के अनुसार, प्रेतशिला की धार्मिक मान्यता प्राचीन ग्रंथों से जुड़ी है। वायु पुराण में इस स्थान पर भगवान ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने का उल्लेख बताया जाता है। यहां स्थित ब्रह्मसरोवर को लेकर भी धार्मिक मान्यता है।
प्राचीन मान्यता के अनुसार यहां भगवान ब्रह्मा के चरणचिह्न और तीन स्वर्ण रेखाएं हैं, जिन्हें तीन प्रेतराज-राजस्य, तामस और सार्थ-का प्रतीक माना जाता है।
ब्रह्मसरोवर में तर्पण, फिर 676 सीढ़ियों की चढ़ाई
पिंडदान की परंपरा के अनुसार श्रद्धालु पहले ब्रह्मसरोवर में स्नान कर तर्पण करते हैं। इसके बाद प्रेतशिला वेदी तक पहुंचने के लिए करीब 676 सीढ़ियां चढ़ते हैं। वेदी पर पिंडदान के बाद पर्वत की परिक्रमा करने का विधान बताया जाता है। अकाल मृत्यु वाले स्वजनों के लिए यहां किए जाने वाले श्राद्ध कर्म को विशेष महत्व दिया जाता है।
सत्तू पिंडदान और सत्तू उड़ाने की अनोखी परंपरा
प्रेतशिला की एक अलग पहचान यहां होने वाला सत्तू पिंडदान है। श्रद्धालु सत्तू से पिंड तैयार कर पितरों को अर्पित करते हैं। धार्मिक परंपरा में पिंडदान के बाद सत्तू उड़ाने को प्रतीकात्मक रूप से आत्मा की मुक्ति से जोड़ा जाता है। इसे प्रेतबाधा से मुक्ति की कामना से जुड़ी परंपरा भी माना जाता है। हालांकि ये धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनका आधार आस्था और परंपरा है।
डोली-खटोली से बुजुर्गों को पहाड़ी चढ़ने में सहारा
676 सीढ़ियों की चढ़ाई बुजुर्ग और असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए कठिन होती है। ऐसे तीर्थयात्रियों के लिए प्रेतशिला पर डोली-खटोली की व्यवस्था है। मांझी समुदाय के लोग कई पीढ़ियों से यह सेवा करते आ रहे हैं। दो श्रमिक मिलकर डोली को कंधे पर उठाकर श्रद्धालुओं को ऊपर तक पहुंचाते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दूरी और यात्री के वजन के आधार पर इसका शुल्क करीब 500 से 1500 रुपए तक रहता है। अधिक वजन होने पर शुल्क बढ़ सकता है।
इस बार रोपवे का इंतजार रहेगा
प्रेतशिला पहाड़ी पर रोपवे निर्माण का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में पितृपक्ष मेला-2026 में श्रद्धालुओं को रोपवे की सुविधा नहीं मिल सकेगी। निर्माण पूरा होने के बाद 2027 के पितृपक्ष में इसके शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। रोपवे शुरू होने से बुजुर्ग, दिव्यांग और शारीरिक रूप से असमर्थ पिंडदानियों को पहाड़ी तक पहुंचने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
पिंडदानियों के लिए जरूरी जानकारी
पितृपक्ष के दौरान प्रेतशिला में भीड़ बढ़ने की संभावना रहती है। पहाड़ी पर जाने वाले श्रद्धालुओं को सीढ़ियों की चढ़ाई को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त समय लेकर निकलना चाहिए। बुजुर्ग और असमर्थ तीर्थयात्री डोली-खटोली की सुविधा का उपयोग कर सकते हैं। ब्रह्मसरोवर में तर्पण और प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान की प्रक्रिया पुरोहितों के मार्गदर्शन में संपन्न की जाती है।
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