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दुष्कर्म पीड़िता के गर्भसमापन पर एमपी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- हर मामले में कोर्ट की अनुमति क्यों? स्वास्थ्य विभाग से मांगा जवाब
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता के गर्भसमापन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने 17 वर्षीय पीड़िता को गर्भसमापन की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था के मामलों में, जहां मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत चिकित्सकों को निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है, वहां हर बार अदालत की अनुमति लेने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
अदालत ने कहा कि ऐसी परंपरा संवेदनशील मामलों में अनावश्यक देरी का कारण बन रही है और पीड़िताओं को समय पर राहत मिलने में बाधा उत्पन्न कर रही है।
17 वर्षीय पीड़िता 10 सप्ताह की गर्भवती थी
मामला मंडला जिले की 17 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता से जुड़ा है, जो लगभग 10 सप्ताह की गर्भवती थी। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गर्भसमापन को सुरक्षित और संभव बताया, हालांकि पीड़िता की कम उम्र और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को देखते हुए प्रक्रिया मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में कराने की अनुशंसा की।
पीड़िता और उसकी मां की लिखित सहमति के आधार पर हाई कोर्ट ने गर्भसमापन की अनुमति प्रदान कर दी।
डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के निर्देश
अदालत ने निर्देश दिए कि पूरी प्रक्रिया विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम की निगरानी में कराई जाए। साथ ही पीड़िता को समुचित उपचार और ऑपरेशन के बाद आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि भ्रूण का डीएनए नमूना सुरक्षित रखकर उसे आपराधिक मामले में साक्ष्य के रूप में संरक्षित किया जाए।
स्वास्थ्य अधिकारियों से मांगा जवाब
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि सक्षम चिकित्सा अधिकारी स्वयं निर्णय लेने के बजाय जिम्मेदारी अदालतों पर छोड़ रहे हैं, जबकि कानून उन्हें आवश्यक अधिकार देता है। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए मंडला के सिविल सर्जन से जवाब तलब किया है।
इसके साथ ही प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संचालक को निर्देश दिए गए हैं कि 24 सप्ताह से कम गर्भावस्था वाले मामलों में एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप चिकित्सकीय स्तर पर ही समयबद्ध निर्णय सुनिश्चित किए जाएं, ताकि पीड़िताओं को राहत के लिए अदालतों का रुख न करना पड़े और न्यायालयों पर अनावश्यक बोझ भी कम हो सके।
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