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दिल्ली में एक महीने में 800 से ज्यादा लोग लापता, हाईकोर्ट ने सरकार और पुलिस से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

दिल्ली में एक महीने में 800 से ज्यादा लोग लापता, हाईकोर्ट ने सरकार और पुलिस से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते एक महीने के दौरान 800 से अधिक लोगों के लापता होने के मामलों ने प्रशासन और न्यायपालिका दोनों को चिंतित कर दिया है। इन बढ़ते मामलों को गंभीरता से लेते हुए Delhi High Court ने दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने पूछा है कि आखिर इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में लोग कैसे गायब हो गए और उन्हें खोजने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि राजधानी में लगातार गुमशुदगी के मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कई मामलों में परिवारों को समय पर जानकारी नहीं दी जाती और जांच की रफ्तार भी धीमी रहती है। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने दिल्ली सरकार और पुलिस से जवाब मांगा कि पिछले एक महीने में कुल कितने लोग लापता हुए, उनमें से कितनों को बरामद किया गया और कितने मामले अभी लंबित हैं।

अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या इन मामलों में कोई पैटर्न सामने आया है—जैसे मानव तस्करी, घरेलू हिंसा, पारिवारिक विवाद, मानसिक स्वास्थ्य या अन्य आपराधिक गतिविधियां। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नागरिकों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है और गुमशुदगी के मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

प्राथमिक जानकारी के अनुसार, बीते एक महीने में 800 से ज्यादा गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज की गईं। हालांकि पुलिस का कहना है कि इनमें से कई मामलों में लोग बाद में अपने घर लौट आए या उन्हें खोज लिया गया, लेकिन बड़ी संख्या में शिकायतों का एक साथ सामने आना चिंता का विषय है।

विशेषज्ञों का मानना है कि महानगरों में गुमशुदगी के मामले कई कारणों से बढ़ते हैं। दिल्ली जैसे बड़े शहर में रोज़गार, शिक्षा, पलायन और सामाजिक दबावों के कारण लोग घर छोड़ देते हैं। कुछ मामलों में किशोर या युवा बिना बताए घर से चले जाते हैं। वहीं, महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में अपराध की आशंका भी रहती है।

दिल्ली पुलिस ने अदालत को आश्वासन दिया है कि सभी मामलों की गंभीरता से जांच की जा रही है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, हर गुमशुदगी की शिकायत पर तुरंत एफआईआर दर्ज की जाती है और संबंधित थाने को जांच सौंपी जाती है। जरूरत पड़ने पर विशेष टीमों और क्राइम ब्रांच की मदद भी ली जाती है।

पुलिस का यह भी कहना है कि कई मामलों में परिवारों की आपसी समझ या व्यक्तिगत कारणों से लोग घर छोड़ देते हैं और बाद में वापस लौट आते हैं। हालांकि, अदालत ने पुलिस से कहा है कि वह केवल सामान्य स्पष्टीकरण देने के बजाय विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करे।

याचिका में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि लापता लोगों में बड़ी संख्या महिलाओं और नाबालिगों की है। अदालत ने पूछा कि क्या ऐसे मामलों में महिला सुरक्षा प्रकोष्ठ, बाल संरक्षण इकाइयों और अन्य एजेंसियों को सक्रिय किया गया है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी मामले में मानव तस्करी या संगठित अपराध की आशंका हो, तो उस दिशा में भी जांच की जाए।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि गुमशुदा बच्चों के मामलों में त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी है, क्योंकि शुरुआती 24 से 48 घंटे सबसे अहम होते हैं। यदि समय पर खोजबीन शुरू हो जाए तो बरामदगी की संभावना बढ़ जाती है।

गुमशुदगी के मामलों में सबसे ज्यादा प्रभावित परिवार होते हैं। कई परिवार महीनों तक अपने प्रियजनों की तलाश में भटकते रहते हैं। पुलिस स्टेशन, अस्पताल, शेल्टर होम और अन्य स्थानों पर खोजबीन के बावजूद उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। ऐसे में हाईकोर्ट की दखल से परिवारों को उम्मीद जगी है कि अब मामलों की गंभीरता से समीक्षा होगी।

कुछ परिवारों ने यह भी आरोप लगाया कि शुरुआती स्तर पर पुलिस शिकायत दर्ज करने में देरी करती है या इसे “घर से भाग जाने” का मामला मानकर गंभीरता नहीं दिखाती। हालांकि पुलिस इन आरोपों से इनकार करती है

हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और पुलिस को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई से पहले विस्तृत स्थिति रिपोर्ट (स्टेटस रिपोर्ट) दाखिल की जाए। इस रिपोर्ट में निम्न बिंदुओं की जानकारी देने को कहा गया है:

  • कुल दर्ज गुमशुदगी के मामले

  • बरामद किए गए व्यक्तियों की संख्या

  • लंबित मामलों की स्थिति

  • जांच की वर्तमान प्रगति

  • भविष्य में रोकथाम के उपाय

अदालत ने यह भी कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह इस मामले में निगरानी जारी रखेगी और आवश्यक निर्देश जारी करेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि गुमशुदगी के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सामुदायिक जागरूकता, परिवारों में संवाद, स्कूलों में काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी पहल भी जरूरी हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया का उपयोग भी खोज अभियान में सहायक हो सकता है।

इसके अलावा, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और सीमावर्ती इलाकों में निगरानी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई की जा सके।

अब सबकी निगाहें अदालत में पेश की जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि रिपोर्ट में गंभीर लापरवाही या खामियां पाई गईं, तो अदालत सख्त निर्देश जारी कर सकती है। वहीं, यदि प्रशासन ठोस कार्रवाई की रूपरेखा पेश करता है, तो इससे भविष्य में गुमशुदगी के मामलों में कमी लाने में मदद मिल सकती है।

दिल्ली में एक महीने के भीतर 800 से ज्यादा लोगों के लापता होने का मामला बेहद गंभीर है। हाईकोर्ट की सख्ती से उम्मीद है कि प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय होगी और जांच प्रक्रिया को और प्रभावी बनाया जाएगा। राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच यह मामला आने वाले दिनों में और अहम हो सकता है। नागरिकों की सुरक्षा और विश्वास बनाए रखना सरकार और पुलिस दोनों की प्राथमिक जिम्मेदारी है, और अब यह देखना होगा कि वे अदालत के समक्ष क्या जवाब पेश करते हैं।

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