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Alpha Movie Review: दमदार एक्शन पर कहानी में नहीं दम, सेकेंड हाफ में है गजब घोटाला; पढ़ें रिव्यू

 

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। स्‍पाई थ्रिलर ‘धुरंधर: द रिवेंज’ की सफलता ने इस जॉनर के स्‍तर को काफी ऊंचा मुकाम दिया है। ऐसे में टाइगर, पठान, वॉर फिल्‍मों में गढ़ी जासूसों की दुनिया को यशराज फिल्‍म्‍स (YRF) ने ऐल्‍फा में आगे बढ़ाया है। यह उनकी स्‍पाई यूनिवर्स की सातवीं फिल्‍म है।

खास बात यह है कि पहली बार अभिनेत्रियों को केंद्रीय भूमिका में रखा गया है। पिछली स्‍पाई यूनिवर्स फिल्मों की तरह यहां पर भी भव्यता, ग्लैमर और ढेर सारा एक्शन, पाकिस्‍तान की कुटिल साजिशें हैं, लेकिन देशभक्ति का भाव काफी हद तक नदारद है, जो इस यूनिवर्स का सबसे अहम पहलू है।

‘ऐल्‍फा’ सीरम के इर्द-गिर्द घूमती है कहानी
कहानी का आरंभ कारगिल युद्ध के अगले दिन से आरंभ होता है। सैन्‍य अधिकारी विक्रांत कॉल (अनिल कपूर) को फतेह सिंह (बॉबी देओल) एक गोपनीय कार्यक्रम के तहत देश के लिए ऐल्‍फा टीम तैयार करने का सुझाव देता है। इन कमांडों की फुर्ती ऐसी कि पलक झपकते दुश्मन को मात दे दें, जिनकी ताकत बड़े-बड़े पहलवानों को धूल चटा दे। माइनस 30 डिग्री तापमान जिसमें लोगों की सांसें थम जाती हैं, वहां ये सीना तानकर डटे रह सकते हैं।

 

दरअसल, यह सब ऐल्फा सीरम की वजह से हो सकता है जिसे भारतीय वैज्ञानिक वर्गीस (दिब्येंदु भट्टाचार्य) ने तैयार किया है। यह सीरम ऊतकों (टिश्यू), मांसपेशियों और अंगों को अधिक मजबूत और दक्ष बनाता है। सुनने की क्षमता, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता, इंद्रियां, फेफड़े यानी शरीर की लगभग हर प्रणाली को बेहतर करता है। अगर घाव जानलेवा न हो, तो ऐल्फा सीरम उसे कुछ ही दिनों में भरने में मदद कर सकता है। अगर कोई एक बार ऐल्फा बन गए, तो पलटा नहीं जा सकता। हालांकि, ऐल्फा सीरम लेने वाले कुछ कमांडों की मौत हो जाती है।

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इस बीच विक्रांत अपनी गर्भवती पत्‍नी (दीया मिर्जा) की जान बचाने के इरादे से उसे भी ऐल्‍फा सीरम पिला देता है। फतेह उसकी बेटी को मरा बताकर अपने साथ ले जाता है, ताकि उस पर प्रयोग कर सके। ऐल्‍फा की विफलता की वजह से उसे चेरांपूजी तैनात किया जाता है। हालांकि, वह एल्‍फा प्रोग्राम को गुपचुप तरीके से चलाता है। वह विक्रांत की बेटी को सीता नाम देता है। वर्गीस अपने प्रयोग सीता पर करता है। व‍हीं फतेह उसे प्रशिक्षित करता है। वह कई लोगों की देशद्रोही बताकर वयस्‍क सीता (आलिया भट्ट) से उनकी हत्‍या करवाता है।

जबकि बुद्धिमान ऐल्‍फा उन्‍हें मारने से पहले एक बार भी उनके बारे में जानने का प्रयास नहीं करती। फतेह किसी खास मिशन पर है। एक दिन सीता खुद उसकी लंका जलाकर विक्रांत की खोज में निकलती है। उसकी मुलाकात अपनी जुड़वा बहन दुर्गा (शरवरी) के साथ विक्रांत से होती है। सीता और दुर्गा को विक्रांत सुरक्षित जगह भेजता है, लेकिन फतेह उन तक पहुंच जाता है। आखिर क्‍या है फतेह की सच्‍चाई? क्‍या है उसका मिशन? क्‍या वह सीता को हरा पाएगा? कहानी इस संबंध में है।

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सेकंड हाफ को मजेदार नहीं बना पाए निर्देशक
वेब सीरीज द रेलवे मैन का निर्देशन करने के बाद शिव रवैल ने ऐल्‍फा को निर्देशित किया है। उदय चोपड़ा की लिखी कहानी ने रॉ प्रमुख बन चुके विक्रांत की बेटियों को ऐल्‍फा के तौर पर पेश किया है। इसमें कमर्शियल स्‍पाई फिल्‍मों के सभी मसाले यानी एक्‍शन, ग्‍लैमरस, खूबसूरत लोकेशन, मंझे कलाकार इत्‍यादि है, लेकिन इसकी कहानी में वह अप्रत्याशित मोड़ और रोमांच नहीं है, जिसकी स्पाई फिल्मों से उम्मीद की जाती हैं।

वाईआरएफ की बाकी स्‍पाई यूनिवर्स की तरह सिनेमेटोग्राफर रूबाइस (Rubais) भी इसे जम्‍मू कश्‍मीर, राजस्‍थान, चेरापूंजी, लेह से लेकर स्‍पेन जैसी जगहों पर ले जाते है। इस दौरान कई नयनाभिरामी लोकेशन मनमोहक है। मध्‍यांतर से पहले कहानी रोमांचक तरीके से आगे बढ़ती है, लेकिन सेकेंड हाफ में अपनी लय को कायम नहीं रख पाती है। सौमिल शुक्‍ला और श्रीधर राघव के लिखे स्‍क्रीन प्‍ले में विक्रांत और सीता के मिलने के बाद उनकी फतेह से भिड़त रोमांचक नहीं बन पाई है।

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फिल्‍म का अहम पहलू इसका एक्‍शन है। एक्‍शन डायरेक्‍टर क्रेग मैकरेब और सुनील रोड्रिग्स (रॉड) की तारीफ बनती हैं। उन्‍होंने छोटे बड़े हथियारों से लेकर हैंड टू हैंड फाइट को काफी दिलचस्‍प बनाया है। सीता और दुर्गा के बीच आपसी तकरार के एक्‍शन सीन शानदार हैं। हालांकि, मजबूत कद-काठी वाले फतेह और दुबली-पतली सीता का मुकाबला विश्वसनीय नहीं लगता। कबीर ( ऋतिक रोशन) की एंट्री भी कहानी में कुछ खास जोड़ती नहीं है। इश्तिा मोइत्रा के संवाद सामान्‍य हैं।

यशराज फिल्म्स की पिछली स्पाई यूनिवर्स से कमजोर
कलाकारों की बात करें तो, फिल्‍म जिगरा में अपना एक्‍शन दिखाने के करीब दो साल बाद आलिया भट्ट विशुद्ध एक्‍शन अवतार में लौटी है। ऐल्‍फा में उनके हिस्‍से में बहुत सारा एक्‍शन आया है। उनकी मेहनत स्‍क्रीन पर साफ झलकती है, हालांकि यह एक्‍शन उनकी कद-काठी पर उतना प्रभावी नहीं लगता।

शरवरी को भी एक्‍शन करने का भरपूर मौका मिला है। फिल्‍म का खास आकर्षण बॉबी देओल हैं। उनकी परफॉमेंस दमदार है। स्क्रिप्‍ट की सीमा में अनिल कपूर अपनी भूमिका साथ न्‍याय करते हैं। दिब्‍येंदु भट्टाचार्य संक्षिप्‍त भूमिका में अपना प्रभाव छोड़ते हैं। जासूसी फिल्‍मों के बढ़ते स्‍तर को देखते हुए यह वाइआरएफ स्‍पाई यूनिवर्स की फिल्‍मों में कमजोर साबित होती है।

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