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Baby Do Die Do Review: अच्छा आइडिया, Huma Qureshi की शानदार परफॉर्मेंस; मेकर्स की गलती ने फिल्म का किया बेड़ा गर्क
प्रियंका सिंह, मुंबई। अभिनय के साथ अभिनेत्री हुमा कुरैशी और उनके भाई साकिब सलीम फिल्म निर्माण में उतर चुके हैं। सिंगल सलमा के बाद उन्होंने बेबी डू डाय डू का निर्माण किया है। यह बेबी छुई मुई नहीं है, बल्कि साइलंट किलर है, यानी वो सुन और बोल नहीं सकती है। यह आइडिया सुनने में रोचक लगता है, लेकिन परदे पर उस तरह से साकार नहीं हो पाया है। बेबी डू डाय डू का हिंदी में अनुवाद करें तो होगा बेबी कर मर कर। दरअसल, फिल्म की नायिका का नाम है बेबी कर मर कर, तो वहीं से इसे अंग्रेजी में टाइटल बना दिया गया।
फिल्म की कहानी
कहानी मुंबई की दो जुड़वा बहनों की है। इनमें एक बोलने और सुनने में अक्षम है। दोनों बचपन में एक बंद पड़े पांच सितारा होटल में जाती हैं। वहां पर एक शख्स को किसी की हत्या करते देखती हैं। वो शख्स उन्हें देख लेता है और एक बहन की हत्या कर देता है। बेबी के परिवार में उसकी बीमार मां है। वहां से कहानी आगे जाती है।
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बेबी (Huma Qureshi)) अब साइलेंट किलर बन चुकी है। पापा (Chunky Pandey) के इशारे पर वह मर्डर करती है। पापा रियल एस्टेट व्यवसायी जफर भाई (सिकंदर खेर) के लिए काम करते हैं। वह उसकी राह में आने वाले लोगों को मारने की सुपारी लेते हैं। बेबी से उसकी ही चौल में रहने वाले अमनदीप सिद्धू (रचित सिंह) को प्रेम हो जाता है। इस बीच हाई कोर्ट में काम करने वाला विटिगो मोरे (कैलाश वाघमारे) ब्रोकर के तौर पर भी करता है। वो एक खाली फ्लैट के सिलसिले में पापा से संपर्क करता है फिर उसमें हथियारों को देखकर उसे ब्लैकमेल करता है।
इस बीच बेबी और अमनदीप शादी करते हैं। पापा बेबी को मोरे को मारने को कहते हैं। वहां से बेबी की जिंदगी में उथल पुथल मचती है। वह पापा से यह काम करने को मना कर देती है। क्या वह इस दुनिया से निकल पाएगी? क्या बेबी अपनी बहन के हत्यारे तक पहुंच पाएगी? कहानी इस संबंध में है।
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बेबी डू डाय डू रिव्यू (Baby Do Die Do Review)
गौरव शर्मा के साथ लिखी नचिकेत की कहानी का फर्स्ट हाफ काफी खिंचा हुआ है। समस्या किरदारों का अधूरा चित्रण और कमजोर स्क्रिनप्ले है। फिल्म की रफ्तार सुस्त है और कहानी में कई घटनाक्रम स्वाभाविक रूप से विकसित होने के बजाय सुविधानुसार गढ़े हुए लगते हैं। पात्र अक्सर ऐसे फैसले लेते हैं, जो तर्कसंगत नहीं लगते इसलिए कहानी से जुड़ाव महसूस नहीं होता।
थ्रिलर होने के बावजूद फिल्म में रोमांच और तनाव नहीं है, जो दर्शकों को अंत तक अपनी सीट से बांधे रख सके। रियल स्टेट की दुनिया और उसमें दुश्मनी का पहलू बहुत सतही तरीके से गढ़ा गया है। पापा छोटे मोटे कांट्रैक्ट लेने की बात करते हैं फिर घर में ढेर सारे हथियार और गोलियों का जखीरा होने का तर्क समझ से परे है।
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बेबी की कांट्रैक्ट किलर बनने की ट्रेनिंग कैसे हुई ? बेबी अपनी बहन के हत्यारे की खोज में होती है लेकिन उसकी तलाश को लेकर बेचैनी दिखती नहीं है। मनु (मरुधर शेखावत) का चित्रण अधूरा है। जफर के भाई लकी (अरुण कुशवाह) को देखकर लगता है लेखक-निर्देशक खुद ही असमंजस में रह गए। बेबी और अमन की साइलेंट लवस्टोरी दिलचस्प नहीं बन पाई है।
पुलिस अधिकारी बनी सीमा पाहवा की प्रतिभा का लेखक निर्देशक समुचित उपयोग नहीं कर पाए हैं, लेकिन सीमित स्क्रीन टाइम में भी वे प्रभाव छोड़ती हैं। बिल्डर मिक्की मुरझानी (हिमांशु मलिक) की निजी जिंदगी को सामान्य भी दिखाते तो कहानी में कोई फर्क नहीं पड़ता। मनु छाता लेकर क्लब जाता है, कोई सवाल नहीं करता? उसे सुरक्षाकर्मी जमा भी नहीं कराते यह खटकता है।
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हुमा कुरैशी पर फिल्म का भार
कलाकारों में फिल्म का भार हुमा कुरैशी के कंधों पर है। उन्होंने साइलेंट किलर की भूमिका को उचित हावभाव के साथ जिया है, लेकिन उनके किरदार को गहराई से विकसित करने की जरूरत थी। अमनदीप के किरदार को बेहतर बनाने की पूरी संभावना थी। उसे सरदार दिखाने का लॉजिक भी समझ नहीं आया। सिकंदर खेर अपने किरदार में जंचते हैं। उन्होंने जफर भाई के कड़क और नरम दोनों पहलुओं को समुचित तरीके से जीया है। चंकी पांडे का अनुभव फिल्म में काम आता है। फिल्म का गीत संगीत कोई प्रभाव नहीं छोड़ता।
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