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आदमपुर से डेरा तक: पीएम मोदी की पंजाब यात्रा का सियासी गणित
पंजाब की राजनीति में 2 फरवरी 2026 का दिन खास रहा, जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने राज्य के जालंधर और आसपास के इलाकों का दौरा किया। यह यात्रा सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम या धार्मिक स्थल दर्शन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक और सामाजिक संदेश छिपा हुआ माना जा रहा है। आदमपुर एयरपोर्ट से लेकर डेरा सचखंड बल्लां तक पीएम मोदी की मौजूदगी ने पंजाब की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा की शुरुआत आदमपुर एयरपोर्ट से हुई, जिसका नामकरण श्री गुरु रविदास महाराज के नाम पर किया गया है। यह फैसला अपने आप में प्रतीकात्मक माना जा रहा है। पंजाब में दलित आबादी की बड़ी हिस्सेदारी है और गुरु रविदास दलित समाज के सबसे बड़े आध्यात्मिक प्रतीकों में से एक हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आदमपुर एयरपोर्ट के नामकरण और पीएम मोदी की मौजूदगी के जरिए केंद्र सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा पंजाब के दलित समुदाय को लेकर गंभीर है और उन्हें केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रखा जा रहा।
आदमपुर के बाद प्रधानमंत्री मोदी का अगला और सबसे अहम पड़ाव था डेरा सचखंड बल्लां। यह डेरा गुरु रविदास परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है और पंजाब के साथ-साथ देश-विदेश में बसे दलित समुदाय में इसका गहरा प्रभाव है।
पीएम मोदी ने डेरा पहुंचकर गुरु रविदास की शिक्षाओं का उल्लेख किया और सामाजिक समरसता, समानता और सम्मान की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार गुरु रविदास के विचारों पर चलते हुए सबका साथ, सबका विकास के मंत्र को आगे बढ़ा रही है।
हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह दौरा सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा का यह कदम दलित वोट बैंक को साधने की दिशा में देखा जा रहा है।
पंजाब की राजनीति में डेरों की भूमिका हमेशा से प्रभावशाली रही है। अलग-अलग डेरों का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों पर देखा जाता है। डेरा सचखंड बल्लां का असर खास तौर पर दोआबा क्षेत्र और दलित समाज में गहरा माना जाता है।
ऐसे में प्रधानमंत्री का सीधे डेरा पहुंचना यह संकेत देता है कि भाजपा पंजाब की जमीनी सामाजिक संरचना को समझते हुए आगे बढ़ रही है। यह दौरा आने वाले समय में अन्य राजनीतिक दलों की रणनीतियों को भी प्रभावित कर सकता है।
पंजाब में भाजपा लंबे समय से सीमित राजनीतिक प्रभाव रखती आई है। अकाली दल से अलगाव के बाद पार्टी को राज्य में नई सामाजिक जमीन तैयार करने की जरूरत है। ऐसे में दलित समुदाय और धार्मिक-सामाजिक संस्थानों से संवाद भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा बनता जा रहा है।
पीएम मोदी की यह यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जहां पार्टी सीधे शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर संवाद स्थापित कर रही है।
प्रधानमंत्री की इस यात्रा पर विपक्षी दलों ने भी प्रतिक्रिया दी है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा धार्मिक स्थलों को राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल कर रही है। उनका कहना है कि दलित समाज को केवल प्रतीकों के जरिए नहीं, बल्कि वास्तविक नीतियों और अधिकारों के जरिए सशक्त किया जाना चाहिए।
हालांकि, भाजपा समर्थकों का कहना है कि गुरु रविदास जैसे संतों की शिक्षाओं को सरकारी नीतियों से जोड़ना गलत नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
यह सवाल लगातार उठ रहा है कि पीएम मोदी की यह यात्रा धार्मिक आस्था से प्रेरित थी या पूरी तरह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
एक ओर प्रधानमंत्री ने सामाजिक समानता, सम्मान और विकास की बात की, वहीं दूसरी ओर यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब भाजपा पंजाब में अपने संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा अभी से सामाजिक समीकरण साधने में जुट गई है। दलित समुदाय, जो पंजाब की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है, उसे साधे बिना सत्ता की राह आसान नहीं है।
आदमपुर एयरपोर्ट का नामकरण और डेरा सचखंड बल्लां का दौरा इसी लंबी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पीएम मोदी के भाषणों और कार्यक्रमों से यह संदेश साफ झलकता है कि केंद्र सरकार पहचान और सम्मान की राजनीति को महत्व दे रही है। धार्मिक और सामाजिक प्रतीकों के जरिए समुदायों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

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