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बिहार राज्यसभा चुनाव: पांचवीं सीट पर सस्पेंस, 7 विधायक बन सकते हैं ‘किंगमेकर
बिहार में होने वाले राज्यसभा चुनाव ने सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। राज्य की पांच सीटों पर चुनाव होना है, लेकिन असली मुकाबला पांचवीं सीट को लेकर है। चार सीटों पर समीकरण लगभग साफ माने जा रहे हैं, जबकि पांचवीं सीट का फैसला कुछ चुनिंदा विधायकों के रुख पर निर्भर करेगा। यही कारण है कि इस सीट को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पूरी ताकत लगा रहे हैं।
बिहार विधानसभा में कुल 243 सदस्य हैं। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को निर्धारित कोटा यानी लगभग 41 वोटों की जरूरत होती है। मौजूदा विधानसभा गणित के मुताबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास इतनी संख्या है कि वह चार सीटें आसानी से जीत सकता है। लेकिन पांचवीं सीट पर मामला फंस सकता है।
एनडीए के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद पांचवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी तरफ विपक्षी खेमे यानी महागठबंधन की कोशिश है कि किसी तरह संख्या जुटाकर इस सीट पर कब्जा किया जाए।
पांचवीं सीट का गणित सात विधायकों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। ये विधायक छोटे दलों या निर्दलीय पृष्ठभूमि से जुड़े हैं, जिनका रुख अंतिम नतीजे को प्रभावित कर सकता है।
इनमें सबसे अहम भूमिका ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के विधायकों की मानी जा रही है। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की रणनीति पर सबकी नजर है। AIMIM के पास बिहार विधानसभा में पांच विधायक हैं। अगर ये विधायक एकमुश्त किसी पक्ष को समर्थन देते हैं तो खेल बदल सकता है।
इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी (BSP) के एक विधायक का वोट भी बेहद अहम है। वहीं कुछ निर्दलीय और छोटे दलों के विधायक भी ऐसे हैं, जो अंतिम समय में किसी भी पक्ष का पलड़ा भारी कर सकते हैं।
एनडीए में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) मुख्य घटक हैं। दोनों दल मिलकर चार सीटें निकालने की स्थिति में हैं। लेकिन पांचवीं सीट के लिए उन्हें या तो क्रॉस वोटिंग की उम्मीद करनी होगी या फिर छोटे दलों का समर्थन जुटाना होगा।
एनडीए रणनीतिक तौर पर छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों से संपर्क साध रहा है। सत्ता पक्ष को उम्मीद है कि राजनीतिक समीकरण और सरकार में भागीदारी जैसे मुद्दे कुछ विधायकों को अपने पक्ष में ला सकते हैं।
दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और उसके सहयोगी दल इस सीट को प्रतिष्ठा का प्रश्न मान रहे हैं। उनके पास खुद पर्याप्त संख्या नहीं है, इसलिए उन्हें AIMIM, BSP और अन्य विधायकों का समर्थन चाहिए।
महागठबंधन का तर्क है कि अगर विपक्ष एकजुट हो जाए तो पांचवीं सीट जीती जा सकती है। लेकिन सवाल यही है कि क्या सभी छोटे दल एक मंच पर आएंगे या अलग-अलग रणनीति अपनाएंगे।
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की भूमिका इस चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उनके पांच विधायकों का समर्थन किसी भी पक्ष के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि AIMIM खुद भी उम्मीदवार उतारने पर विचार कर सकती है। अगर ऐसा होता है तो वोटों का बंटवारा और जटिल हो जाएगा।
ओवैसी की रणनीति अब तक स्पष्ट नहीं है। वे किसे समर्थन देंगे या स्वतंत्र रुख अपनाएंगे, यह चुनाव से ठीक पहले ही साफ हो पाएगा। यही वजह है कि उन्हें इस चुनाव का ‘किंगमेकर’ कहा जा रहा है।
राज्यसभा चुनाव में गुप्त मतदान नहीं बल्कि खुला मतदान होता है, लेकिन फिर भी क्रॉस वोटिंग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर कुछ विधायक पार्टी लाइन से हटकर वोट करते हैं तो पूरा गणित बदल सकता है।
पिछले चुनावों में भी ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जब अंतिम समय में समीकरण बदल गए। इसलिए इस बार भी दोनों पक्ष अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं।
नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद मतदान निर्धारित तारीख को होगा। यदि पांचवीं सीट पर एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में रहे तो मुकाबला रोचक होगा। जीत के लिए आवश्यक कोटा हासिल करने के लिए उम्मीदवारों को प्राथमिकता वोटों की गणना से गुजरना होगा।
पांचवीं सीट का नतीजा केवल एक सीट का मामला नहीं है। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा। अगर एनडीए पांचों सीटें जीत लेता है तो यह उसके लिए बड़ी राजनीतिक बढ़त होगी। वहीं अगर महागठबंधन पांचवीं सीट निकाल लेता है तो यह विपक्षी एकजुटता का संदेश देगा।
अब सबकी निगाहें उन सात विधायकों पर टिकी हैं, जिनके वोट से तस्वीर साफ होगी। क्या वे किसी एक खेमे के साथ खुलकर जाएंगे या अंतिम समय तक सस्पेंस बनाए रखेंगे—यह आने वाला समय बताएगा।
बिहार की राजनीति में यह चुनाव संख्या बल से ज्यादा रणनीति और तालमेल की परीक्षा बन चुका है। पांचवीं सीट पर किसकी जीत होगी, इसका फैसला अब इन सात विधायकों के रुख पर निर्भर करता है।

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