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बुंदेलखंड की बेटी ने लॉर्ड्स में रचा इतिहास, ऑनर्स बोर्ड पर नाम दर्ज कराने वाली पहली महिला क्रिकेटर बनीं क्रांति गौड़

क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स स्टेडियम के पैवेलियन में कभी महिलाओं को प्रवेश की भी अनुमति नहीं थी। स्वयं को आधुनिक बताने वाले अंग्रेजों ने 142 साल में पहली बार महिलाओं को इस मैदान में टेस्ट खेलने की अनुमति दी। इस ऐतिहासिक मुकाबले की नायिका क्रांति गौड़ को प्रतिष्ठित ऑनर्स बोर्ड पर अपना नाम लिखने के लिए आमंत्रित किया गया।

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच एक युवती सामने आती है। उसके चेहरे पर परिपक्वता नहीं, मासूमियत झलक रही है। 22 साल की उम्र में उसे भी शायद न पता हो कि दुनिया में जब भी क्रिकेट की बात होगी, लॉर्ड्स के ऑनर्स बोर्ड पर पहली महिला क्रिकेटर के रूप में वह हमेशा याद की जाएगी। यह क्रिकेट की दुनिया में महिलाओं को समानता की दिशा में एक नई क्रांति भी है।

भारतीय टीम की जीत में अहम योगदान

भारतीय महिला टीम ने इंग्लैंड को इस टेस्ट में 270 रनों से हराया। इसमें क्रांति ने पहली पारी में पांच विकेट झटके और मैच में कुल सात बल्लेबाजों को आउट किया। क्रांति गौड़ मध्य प्रदेश के उस बुंदेलखंड इलाके से आती हैं, जहां की पहचान झांसी की रानी रही हैं। मानो अंग्रेजों के दांत खट्टे करने का हौसला विरासत में मिला।

मैच के बाद क्रांति ने कहा कि उन्होंने बचपन में कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऑनर्स बोर्ड पर उनका नाम होगा। मप्र के छतरपुर जिले के घुवारा में रहने वाले आदिवासी परिवार की क्रांति का सफर उनकी तूफानी गेंदों की तरह सीधा नहीं रहा। पुलिस में कांस्टेबल रहे पिता मुन्ना सिंह की नौकरी छूट चुकी थी, आर्थिक हालात खराब थे। क्रांति को क्रिकेट का शौक था तो लड़कों के साथ खेलती थी।

अभावों के बीच किया कमाल

2017 में सागर की टीम में एक लड़की कम थी। क्रांति को मौका मिला तो कमाल कर दिया। लगा बेटी में योग्यता है तो पिता साइकिल से छतरपुर ट्रेनिंग दिलाने ले जाने लगे। कोच राजीव बिल्थरे बताते हैं, मैंने उनसे कहा कि यहां रहकर मेहनत करनी होगी। मुश्किल यह थी कि पिता के पास शहर में ठहराने और खिलाने के पैसे नहीं थे। एक सप्ताह मेरे घर पर रही और फिर करीब दो साल साथी खिलाड़ी सुषमा विश्वकर्मा के घर पर रहीं। पहनने के लिए जूते और ड्रेस की व्यवस्था भी मैंने ही की।

दूसरों के ताने भी नहीं डिगा सके हौसला

पैसों की तंगी थी तो नौवीं के बाद पढ़ाई भी ठहर गई। मगर समस्या सिर्फ पैसों की तंगी तक ही नहीं थी। गांव की लड़की शहर में रहकर क्रिकेट खेल रही थी तो ग्रामीणों ने परिवार को खूब टोका। लड़की से शादी कौन करेगा, इसे तो रसोई का काम सिखाओ… जैसी बातें भी कहीं। मगर न पिता डिगे और न परिवार। क्रांति एक ही साल में मप्र जूनियर टीम में पहुंची और फिर सीनियर टीम के साथ भारतीय टीम में।

क्रांति ने किस्मत बदल दी

क्रांति जब भारतीय टीम के साथ विश्व चैंपियन बनीं तो मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनके पिता की नौकरी फिर बहाल कर दी। क्रांति को भी सरकारी नौकरी देने की घोषणा की। बेटी ने पिता को उपहार में बड़ी कार दी। कोच बिल्थरे बताते हैं, इस साल क्रांति ने 10वीं की ओपन परीक्षा का फार्म भरा है। क्रांति में आत्मविश्वास बहुत है। इसी कारण से वह हर परिस्थिति में बेहतर प्रदर्शन करती है।

आंकड़ों पर नजर

2- टेस्ट
17- वनडे
14- टी-20

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