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पंजाब

पंजाब में MGNREGA बचाओ रैली: कांग्रेस ने सरकार को घेरा, रोजगार और ग्रामीण विकास पर उठे सवाल

पंजाब में कांग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित “MGNREGA बचाओ रैली” ने प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है। इस रैली में हजारों की संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता, ग्रामीण मजदूर, किसान और स्थानीय नेता शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर ग्रामीण रोजगार योजना को कमजोर करने का आरोप लगाया।

रैली के दौरान कांग्रेस नेताओं ने कहा कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) देश के गरीब, मजदूर और ग्रामीण परिवारों के लिए जीवनरेखा है। इस योजना के जरिए करोड़ों परिवारों को हर साल न्यूनतम रोजगार मिलता है, जिससे उनके घर का खर्च चलता है और पलायन पर भी रोक लगती है।

कांग्रेस का आरोप

कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार मनरेगा के बजट में कटौती कर रही है और काम के दिन कम किए जा रहे हैं। कई जिलों में मजदूरों को समय पर मजदूरी नहीं मिल रही, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो रही है।

रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा,
“मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि गरीब की उम्मीद है। अगर इसे कमजोर किया गया तो लाखों परिवार बेरोजगारी और भूख की ओर धकेल दिए जाएंगे।”

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार आंकड़ों में रोजगार दिखा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। कई गांवों में काम ही उपलब्ध नहीं है, जबकि मजदूर रोजगार के लिए भटक रहे हैं।

कार्यकर्ताओं में दिखा आक्रोश

रैली में शामिल कार्यकर्ताओं ने हाथों में पोस्टर और बैनर लेकर सरकार के खिलाफ नारे लगाए। “मनरेगा बचाओ”, “गरीबों का हक मत छीनो” और “रोजगार दो, राजनीति नहीं” जैसे नारों से पूरा इलाका गूंज उठा।

ग्रामीण महिलाओं और मजदूरों ने भी अपनी परेशानियां साझा कीं। उनका कहना था कि मनरेगा से मिलने वाली मजदूरी उनके घर की सबसे बड़ी सहारा है। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें इसी से पूरी होती हैं।

राजनीतिक रणनीति या जनहित?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह रैली आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर भी आयोजित की गई है। कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर ग्रामीण वोट बैंक को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है।

विश्लेषकों के अनुसार, मनरेगा ऐसा विषय है जिससे सीधे आम जनता जुड़ी हुई है, इसलिए इस पर राजनीति करना चुनावी दृष्टि से फायदेमंद माना जाता है। कांग्रेस इसे सरकार के खिलाफ एक मजबूत हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

सरकार का पक्ष

वहीं राज्य सरकार ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सरकार का कहना है कि मनरेगा में कोई कटौती नहीं की जा रही, बल्कि इसे और पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा रहा है।

सरकारी प्रवक्ता ने कहा,
“मनरेगा को डिजिटल बनाया जा रहा है ताकि भ्रष्टाचार खत्म हो और मजदूरी सीधे मजदूरों के खाते में पहुंचे। सरकार का लक्ष्य योजना को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाना है।”

सरकार ने यह भी दावा किया कि इस वर्ष मनरेगा के तहत लाखों परिवारों को रोजगार दिया गया है और आने वाले समय में और अधिक काम उपलब्ध कराया जाएगा।

ग्रामीण इलाकों में असली तस्वीर

हालांकि जमीनी स्तर पर कई जगहों से अलग-अलग तस्वीर सामने आ रही है। कुछ जिलों में मजदूर काम न मिलने की शिकायत कर रहे हैं, तो कहीं भुगतान में देरी की समस्या सामने आ रही है। इससे सरकार और विपक्ष के दावों के बीच बड़ा अंतर नजर आता है।

आगे क्या?

मनरेगा को लेकर यह विवाद अब सिर्फ एक रैली तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में यह मुद्दा पंजाब की राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है। कांग्रेस जहां इसे जनआंदोलन का रूप देने की तैयारी में है, वहीं सरकार अपनी योजनाओं को सही साबित करने में जुटी है।

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