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हरियाणा

हरियाणा में 4 सोलर-पावर्ड इंटीग्रेटेड माइक्रो-इरिगेशन परियोजनाओं को मंजूरी, ₹402 करोड़ से अधिक की लागत से करीब 9,000 किसानों को मिलेगा लाभ

हरियाणा में 4 सोलर-पावर्ड इंटीग्रेटेड माइक्रो-इरिगेशन परियोजनाओं को मंजूरी, ₹402 करोड़ से अधिक की लागत से करीब 9,000 किसानों को मिलेगा लाभ

हरियाणा सरकार ने खेती और सिंचाई के क्षेत्र में एक बड़ा और दूरदर्शी कदम उठाते हुए राज्य में चार सोलर-पावर्ड इंटीग्रेटेड माइक्रो-इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचाई) परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। इन परियोजनाओं पर ₹402 करोड़ से अधिक की राशि खर्च की जाएगी। सरकार का दावा है कि इन योजनाओं से राज्य के विभिन्न जिलों के लगभग 9,000 किसानों को सीधे तौर पर लाभ मिलेगा और जल संरक्षण के साथ-साथ फसल उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब जल संकट और बढ़ती बिजली लागत किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। राज्य के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे पारंपरिक सिंचाई पद्धतियाँ महंगी और अस्थिर होती जा रही हैं। ऐसे में सौर ऊर्जा आधारित माइक्रो-इरिगेशन सिस्टम किसानों के लिए राहत की किरण साबित हो सकता है।

क्या है सोलर-पावर्ड इंटीग्रेटेड माइक्रो-इरिगेशन?

माइक्रो-इरिगेशन का मतलब है फसलों को बूंद-बूंद या नियंत्रित मात्रा में पानी उपलब्ध कराना, जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम के माध्यम से। जब इसे सौर ऊर्जा से जोड़ा जाता है, तो सिंचाई के लिए डीजल या ग्रिड बिजली पर निर्भरता काफी कम हो जाती है।

इस नई योजना के तहत खेतों में सोलर पंप लगाए जाएंगे, जो सूरज की रोशनी से चलकर पानी को पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए सीधे फसलों तक पहुँचाएंगे। इससे पानी की बर्बादी रुकेगी और ऊर्जा की लागत भी घटेगी।

किसानों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है और यहां की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है। धान और गेहूं जैसी फसलों की सिंचाई के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। पारंपरिक बाढ़ सिंचाई पद्धति में पानी का बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है।

नई परियोजनाओं के लागू होने के बाद—

  • पानी की खपत में 30–50% तक कमी आने की उम्मीद है।

  • बिजली और डीजल पर होने वाला खर्च घटेगा।

  • फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में सुधार होगा।

  • छोटे और सीमांत किसानों को विशेष राहत मिलेगी।

कई किसान लंबे समय से ऐसी योजना की मांग कर रहे थे जो पानी और बिजली दोनों की समस्या का समाधान करे। सरकार का कहना है कि यह पहल खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाएगी।

किन जिलों को मिलेगा लाभ?

हालांकि विस्तृत जिला-वार सूची जल्द जारी की जाएगी, लेकिन जानकारी के अनुसार इन परियोजनाओं का लाभ राज्य के उन क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर दिया जाएगा जहां जल संकट ज्यादा गंभीर है और भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।

सरकार का उद्देश्य है कि पहले चरण में चयनित जिलों में पाइपलाइन नेटवर्क और सोलर पंप की स्थापना की जाए, उसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी इसे विस्तार दिया जाए।

जल संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रो-इरिगेशन प्रणाली जल संरक्षण के लिए बेहद प्रभावी है। पारंपरिक सिंचाई में जहां खेतों में पानी भर दिया जाता है, वहीं ड्रिप सिस्टम में फसल की जड़ों तक ही पानी पहुंचाया जाता है। इससे न केवल पानी की बचत होती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है।

हरियाणा जैसे राज्य में, जहां भूजल दोहन लगातार बढ़ रहा है, यह कदम आने वाले वर्षों में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

सौर ऊर्जा से किसानों को राहत

बिजली की अनियमित आपूर्ति और बढ़ते बिल किसानों के लिए बड़ी समस्या रहे हैं। डीजल पंप चलाना भी महंगा पड़ता है। सोलर-पावर्ड पंप लगने से किसान दिन के समय मुफ्त ऊर्जा का उपयोग कर सकेंगे।

एक बार सिस्टम स्थापित हो जाने के बाद रखरखाव का खर्च भी अपेक्षाकृत कम होता है। इससे किसानों की आय में स्थिरता आएगी और खेती की लागत घटेगी।

रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे

इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। पाइपलाइन बिछाने, सोलर पैनल लगाने और तकनीकी देखरेख के लिए कुशल और अर्द्ध-कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

सरकार की प्राथमिकता: टिकाऊ खेती

राज्य सरकार का कहना है कि वह कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। जलवायु परिवर्तन और घटते प्राकृतिक संसाधनों के दौर में खेती को टिकाऊ बनाना बेहद जरूरी है।

इन चार परियोजनाओं को उसी दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में सरकार अन्य जिलों में भी ऐसी योजनाएं लागू करने पर विचार कर सकती है।

किसानों की प्रतिक्रिया

कई किसानों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अगर योजना पारदर्शी तरीके से लागू होती है और सब्सिडी का लाभ समय पर मिलता है, तो इससे खेती में नई ऊर्जा आएगी।

हालांकि कुछ किसानों ने यह भी सुझाव दिया है कि सरकार को प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाने चाहिए ताकि किसान नई तकनीक का सही उपयोग कर सकें।

आगे की राह

अब सबसे अहम चरण होगा इन परियोजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना समयबद्ध तरीके से पूरी होती है और किसानों को तकनीकी सहायता मिलती है, तो यह मॉडल पूरे देश के लिए मिसाल बन सकता है।

राज्य सरकार की इस पहल से यह संकेत मिलता है कि हरियाणा खेती को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढालने की दिशा में गंभीर है।

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निष्कर्ष:
₹402 करोड़ से अधिक की लागत वाली चार सोलर-पावर्ड माइक्रो-इरिगेशन परियोजनाएं हरियाणा के किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई हैं। जल संरक्षण, ऊर्जा बचत और बेहतर उत्पादन—इन तीनों मोर्चों पर यह पहल राज्य की कृषि व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। यदि योजनाएं सफल रहीं, तो आने वाले वर्षों में हरियाणा टिकाऊ और आधुनिक खेती का उदाहरण बन सकता है।

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