उत्तर प्रदेश
बड़ौत विधानसभा सीट पर क्या जयंत चौधरी कर पाएंगे वापसी? समझिए इस सीट का पूरा समीकरण
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सीटों में शुमार बागपत की बड़ौत विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर सियासी गर्माहट अभी से बढ़ने लगी है. यह सीट भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) और समाजवादी पार्टी -तीनों के लिए साख का सवाल बनी हुई है. 2022 के विधानसभा चुनाव में महज 315 वोटों के बेहद कम अंतर से जीत दर्ज करने वाले योगी सरकार के वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री केपी मलिक की प्रतिष्ठा यहां दांव पर है. वहीं पिछले चुनाव में सपा के साथ गठबंधन में लड़ी आरएलडी अब बीजेपी के साथ एनडीए का हिस्सा है जिससे बड़ौत का पूरा राजनीतिक समीकरण ही बदल गया है.
बड़ौत सीट का इतिहास और चुनावी रिकॉर्ड
बड़ौत विधानसभा सीट का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है.
बदला गठबंधन का समीकरण और टिकट पर सस्पेंस
2022 में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने वाली आरएलडी अब एनडीए का हिस्सा है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि 2027 में यह सीट आरएलडी के खाते में जाएगी या बीजेपी एक बार फिर केपी मलिक पर ही दांव लगाएगी.
बड़ौत का निर्णायक जातीय गणित
बड़ौत में जाट, मुस्लिम और दलित (एससी) मतदाता हार-जीत तय करने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं. सीट का अनुमानित जातीय आंकड़ा इस प्रकार है-
जाट मतदाता: करीब 70,000
मुस्लिम मतदाता: करीब 45,000
अनुसूचित जाति (SC): करीब 30,000
वैश्य मतदाता: करीब 25,000
कश्यप मतदाता: करीब 18,000
गुर्जर एवं ब्राह्मण: करीब 15,000 – 15,000
क्षत्रिय मतदाता: करीब 12,000
त्यागी मतदाता: करीब 8,000
प्रजापति एवं सैनी: करीब 7,000 – 7,000
पाल एवं सिख: करीब 3,000 से 4,000
स्थानीय पत्रकारों का विश्लेषण: कितना असरदार होगा गठबंधन?
स्थानीय विश्लेषकों और पत्रकारों के मुताबिक, बड़ौत में मुकाबला काफी दिलचस्प होने की संभावना है.
वोट ट्रांसफर की चुनौती: दो बड़ी पार्टियों के शीर्ष स्तर पर हाथ मिलाने से यह जरूरी नहीं कि जमीनी स्तर पर मतदाताओं का वोट पूरी तरह ट्रांसफर हो जाए.
विपक्षी मोर्चा: यदि 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी) का साथ मिलता है तो मुकाबला और भी त्रिकोणीय व कड़ा हो जाएगा.
मौजूदा बढ़त: हालांकि, केपी मलिक के दो बार के जमीनी आधार और आरएलडी कार्यकर्ताओं के एनडीए के साथ सक्रिय होने से फिलहाल बीजेपी-आरएलडी गठबंधन का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है.
फिलहाल प्रत्याशियों के नाम के ऐलान और विपक्षी मोर्चे की अंतिम घेराबंदी के बाद ही बड़ौत के असली चुनावी ‘अखाड़े’ की तस्वीर साफ होगी.
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