उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल… क्या 2026 में हो जाएंगे यूपी विधानसभा चुनाव? सामने आई ये इनसाइड स्टोरी
‘आज का यूपी’ राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक हलचलों का सटीक विश्लेषण लेकर हाजिर है.। आज के इस खास एपिसोड में हम उत्तर प्रदेश की सियासत को गरमाने वाली तीन सबसे बड़ी खबरों का विश्लेषण कर रहे हैं. इस शो की पहली बड़ी खबर देश में होने वाली आगामी डिजिटल और फिजिकल जनगणना (सेंसस) से जुड़ी है जिसके चलते उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को वक्त से पहले यानी इसी साल कराए जाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है. दूसरी बड़ी खबर के रूप में हम उन मुख्य प्रशासनिक और तकनीकी कारणों पर रोशनी डाल रहे हैं, जिनकी वजह से चुनाव आयोग फरवरी-मार्च के बजाय नवंबर-दिसंबर में चुनाव कराने पर मंथन कर सकता है. वहीं शो की तीसरी बड़ी खबर के अंतर्गत इस संभावित ‘अर्ली पोल’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी समेत अन्य राजनीतिक दलों की तैयारियों और इसके चुनावी नफे-नुकसान का पूरा राजनीतिक विश्लेषण किया गया है.
1. देश में होने वाली महा-जनगणना के चलते चुनाव प्रीपोन होने की सुगबुगाहट
‘आज का यूपी’ शो की पहली बड़ी खबर के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की सियासत और गलियारों में इन दिनों एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. चर्चा यह है कि उत्तर प्रदेश में जो विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी-मार्च में होने तय हैं, वे वक्त से पहले इसी साल के अंत में कराए जा सकते हैं. इस पूरी चर्चा के केंद्र में देश में होने वाली महा-जनगणना (सेंसस) की मैसिव एक्सरसाइज है. दरअसल, कैबिनेट नोट के जरिए यह लगभग तय हो चुका है कि अगले साल 1 फरवरी से 15 मार्च के बीच देश में बड़े पैमाने पर फिजिकल जनगणना का काम किया जाना है. इस प्रक्रिया में प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मियों को घर-घर जाकर वेरिफिकेशन करना होगा. एक ही समय पर इतनी बड़ी प्रशासनिक मशीनरी को जनगणना और चुनाव दोनों में एक साथ झोंकना व्यावहारिक रूप से असंभव माना जा रहा है, जिसके चलते चुनावों को पहले कराने की सुगबुगाहट तेज है.

2. क्यों फरवरी-मार्च के बजाय नवंबर-दिसंबर में चुनाव कराने का बन रहा है समीकरण?
शो की दूसरी बड़ी खबर इस बात का विश्लेषण करती है कि आखिर चुनाव कराने के लिए नवंबर और दिसंबर का महीना ही क्यों सबसे मुफीद माना जा रहा है. दरअसल, जनगणना विभाग ने चुनाव आयोग को पहले ही अलर्ट भेज दिया है कि फरवरी-मार्च में उनका एक बड़ा अभियान चलने वाला है. नियमतः, चुनाव आयोग किसी भी विधानसभा के गठित होने के 6 महीने पहले कभी भी चुनावों का ऐलान कर सकता है जिसके लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं होती. आयोग चुनाव को आगे तो नहीं टाल सकता क्योंकि ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ेगा. लेकिन वह इसे पहले (प्रीपोन) जरूर कर सकता है.
3. ‘अर्ली पोल्स’ पर बीजेपी और सपा का रुख: किसे होगा फायदा और किसे नुकसान?
तीसरी बड़ी खबर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और इसके इतिहास से जुड़ी है. वक्त से पहले चुनाव होने की इस चर्चा को लेकर उत्तर प्रदेश की दोनों मुख्य पार्टियां अपनी-अपनी जीत के दावे कर रही हैं. बीजेपी नेताओं का कहना है कि वे हमेशा चुनाव के लिए तैयार रहते हैं. बीजेपी को लगता है कि हालिया राज्यों में मिली जीत का जो मोमेंटम देश में बना हुआ है, वह यूपी और उत्तराखंड में भी काम आएगा. दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल सपा का भी कहना है कि वह हर परिस्थिति के लिए तैयार है. सपा को लगता है कि बीजेपी इस मोमेंटम को खोना नहीं चाहती, इसलिए यह चर्चाएं हैं.

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