हरियाणा टीबी उन्मूलन की दिशा में मजबूती से आगे, 2025 में 98% डिटेक्शन लक्ष्य हासिल
हरियाणा ने क्षय रोग (टीबी) उन्मूलन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। मजबूत डायग्नोस्टिक नेटवर्क, डिजिटल निगरानी तंत्र और मरीज-केंद्रित पहलों के दम पर राज्य अब टीबी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025 में हरियाणा ने टीबी मामलों की पहचान (डिटेक्शन) के अपने लक्ष्य का 98% हासिल कर यह साबित किया कि सुनियोजित रणनीति और बहु-क्षेत्रीय भागीदारी से बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों पर काबू पाया जा सकता है।
मजबूत जांच व्यवस्था ने बदली तस्वीर
टीबी उन्मूलन की राह में सबसे अहम कड़ी है—समय पर और सटीक जांच। हरियाणा ने पिछले कुछ वर्षों में जिला और ब्लॉक स्तर तक जांच सुविधाओं का विस्तार किया है। अत्याधुनिक लैब, रैपिड मॉलिक्यूलर टेस्टिंग मशीनें और सैंपल कलेक्शन की बेहतर व्यवस्था ने मरीजों की पहचान की गति बढ़ाई है।
पहले जहां ग्रामीण इलाकों में जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था, वहीं अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक सैंपल की त्वरित जांच संभव हो रही है। इससे शुरुआती चरण में ही टीबी के मामलों का पता चल रहा है, जो इलाज की सफलता दर को बढ़ाने में निर्णायक साबित हो रहा है।
डिजिटल निगरानी से पारदर्शिता और ट्रैकिंग
राज्य ने टीबी नियंत्रण कार्यक्रम को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़कर निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है। मरीजों का पंजीकरण, दवाओं की उपलब्धता, फॉलो-अप और उपचार की प्रगति—इन सभी को ऑनलाइन ट्रैक किया जा रहा है।
डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से स्वास्थ्य अधिकारी वास्तविक समय (रियल टाइम) में आंकड़ों की समीक्षा कर सकते हैं। इससे किसी भी जिले में मामलों की बढ़ोतरी या दवा वितरण में देरी जैसी समस्याओं पर तुरंत कार्रवाई संभव हो पाती है।
यह डिजिटल प्रयास न केवल पारदर्शिता बढ़ाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि कोई मरीज इलाज के दौरान छूट न जाए।
मरीज-केंद्रित पहल: संवेदनशीलता के साथ सेवा
टीबी उन्मूलन केवल दवा देने तक सीमित नहीं है। यह एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। हरियाणा सरकार ने इस तथ्य को समझते हुए मरीज-केंद्रित पहलें शुरू की हैं।
राज्य ने एक समर्पित पोर्टल लॉन्च किया है, जहां मरीज अपनी जांच रिपोर्ट, दवा की जानकारी और सहायता योजनाओं से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा टीबी से उबर चुके लोगों (सर्वाइवर्स) के लिए समर्थन सेवाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि वे समाज में सामान्य जीवन जी सकें और दूसरों को जागरूक कर सकें।
पोषण सहायता, परामर्श सेवाएं और सामुदायिक सहयोग कार्यक्रमों ने मरीजों के मनोबल को मजबूत किया है। कई स्थानों पर स्वयंसेवी समूह और स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर-घर जाकर मरीजों की निगरानी और मार्गदर्शन कर रहे हैं।
निजी क्षेत्र की भागीदारी से बढ़ी ताकत
टीबी उन्मूलन में निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। 2025 में 98% डिटेक्शन लक्ष्य हासिल करने में निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी ने बड़ा योगदान दिया।
सरकार ने निजी डॉक्टरों और लैब्स को राज्य की टीबी रिपोर्टिंग प्रणाली से जोड़ा है, जिससे सभी मामलों का समेकित डेटा उपलब्ध हो रहा है। इससे वास्तविक स्थिति का आकलन आसान हुआ है और उपचार की निरंतरता बनी रही है।
निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन और प्रशिक्षण देकर यह सुनिश्चित किया गया कि वे राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप मरीजों का इलाज करें।
जागरूकता अभियान से बदली सोच
टीबी को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां और सामाजिक कलंक जुड़े रहे हैं। हरियाणा ने व्यापक जागरूकता अभियानों के माध्यम से इस मानसिकता को बदलने की कोशिश की है।
स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और औद्योगिक इकाइयों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। रेडियो, सोशल मीडिया और स्थानीय कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश दिया गया कि टीबी का इलाज संभव है और समय पर उपचार से मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।
इन अभियानों का सकारात्मक असर देखने को मिला है—लोग अब लक्षण दिखने पर जांच कराने में हिचकिचाते नहीं हैं।
पोषण और सामाजिक सहयोग पर जोर
टीबी के इलाज में पोषण की अहम भूमिका होती है। राज्य ने जरूरतमंद मरीजों के लिए पोषण सहायता योजनाओं को मजबूत किया है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से आर्थिक सहायता पहुंचाई जा रही है, ताकि मरीज इलाज के दौरान पौष्टिक आहार ले सकें।
सामुदायिक स्वयंसेवकों और आशा कार्यकर्ताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे मरीजों के घर जाकर दवा सेवन की निगरानी करते हैं और किसी भी समस्या की जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुंचाते हैं।
2025 की उपलब्धि: 98% लक्ष्य प्राप्ति
वर्ष 2025 में हरियाणा द्वारा टीबी डिटेक्शन लक्ष्य का 98% हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य ने सक्रिय खोज (एक्टिव केस फाइंडिंग), व्यापक जांच और बेहतर डेटा प्रबंधन के माध्यम से अधिकतम संभावित मामलों की पहचान की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार बनी रही तो राज्य टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ सकेगा।
आगे की चुनौतियां और रणनीति
हालांकि प्रगति उत्साहजनक है, लेकिन चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी, प्रवासी मजदूरों तक पहुंच और शहरी झुग्गी बस्तियों में जांच कवरेज बढ़ाना अब भी प्राथमिकता के क्षेत्र हैं।
राज्य सरकार का कहना है कि वह नई तकनीकों, मोबाइल जांच वैन और सामुदायिक भागीदारी को और मजबूत करेगी। साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म को और अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाया जाएगा।
निष्कर्ष
हरियाणा ने यह दिखाया है कि मजबूत डायग्नोस्टिक्स, डिजिटल नवाचार और मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण के मेल से टीबी जैसी गंभीर बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। 2025 में 98% डिटेक्शन लक्ष्य हासिल करना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की समर्पित मेहनत और सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
यदि इसी प्रतिबद्धता और समन्वय के साथ काम जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में हरियाणा टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है। यह न केवल राज्य के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरक उदाहरण साबित होगा।