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चार दिन में बदला फैसला, पटना हाईकोर्ट ने पकड़ी बड़ी कानूनी खामी; POCSO केस में चार की जमानत रद

खगड़िया के पॉक्सो मामले में चार आरोपितों को दी गई नियमित जमानत पटना हाईकोर्ट ने रद कर दी है। न्यायाधीश संदीप कुमार ने सात अगस्त को फैसला सुनाते हुए कहा कि विशेष अदालत ने चार दिन पहले उन्हीं आरोपितों की अग्रिम जमानत खारिज की थी, लेकिन 19 जुलाई 2025 को उनके आत्मसमर्पण के दिन उसी सामग्री के आधार पर नियमित जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने इस आदेश को गंभीर कानूनी खामी माना।

15 जुलाई को जमानत खारिज, 19 को मिली राहत

मामला खगड़िया महिला थाना कांड संख्या 9/2025 से जुड़ा है। विशेष न्यायाधीश ने 15 जुलाई 2025 को आरोपितों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज की थी।

केस डायरी में सूचक, पीड़िता और अन्य गवाहों के बयान अभियोजन के समर्थन में पाए गए थे। चोट की रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर थी और आरोपितों के खिलाफ विशिष्ट आरोप दर्ज थे।

इसके महज चार दिन बाद चार आरोपितों ने आत्मसमर्पण किया और उसी दिन उन्हें नियमित जमानत दे दी गई।

हाईकोर्ट ने पूछा- चार दिन में क्या बदल गया?

हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को साथ पढ़ते हुए कहा कि 15 और 19 जुलाई के बीच सिर्फ दो चीजें बदली थीं। आरोपितों ने आत्मसमर्पण किया और विशेष लोक अभियोजक ने जमानत पर सहमति जताई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्मसमर्पण नियमित जमानत की सुनवाई की शर्त हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में जमानत देने के पक्ष में नई परिस्थिति नहीं बन जाता।

अभियोजक की सहमति से खत्म नहीं होती कोर्ट की जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से जमानत पर सहमति जताने के बावजूद अदालत की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। अदालत को केस डायरी में उपलब्ध सामग्री पर स्वतंत्र न्यायिक विचार करना होता है।

कोर्ट के अनुसार विशेष न्यायाधीश ने वस्तुतः चार दिन पुराने अपने ही आदेश की समीक्षा कर उसे पलट दिया, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं था।

पीड़िता की मां को भी नहीं दिया गया मौका

हाईकोर्ट ने यह भी गंभीरता से लिया कि नियमित जमानत देते समय पीड़िता की मां और मामले की सूचक को न तो नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर मिला।

अदालत ने माना कि पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामले में पीड़ित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर देना महत्वपूर्ण है। इसी आधार पर भी निचली अदालत के आदेश पर सवाल उठे।

जमानत के स्तर पर पॉक्सो आरोप तय नहीं हो सकता

फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत के स्तर पर यह निष्कर्ष निकालना कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पॉक्सो के तहत आरोप ही नहीं बनता, अदालत की सीमित भूमिका से आगे जाना है।

इस चरण में अदालत को केवल प्रथमदृष्टया सीमित राय बनानी होती है। पॉक्सो के तहत आरोप बनता है या नहीं, इसका निर्धारण आरोप तय करने के चरण और बाद में ट्रायल के दौरान होना है।

चोट साधारण होने से पॉक्सो आरोप खत्म नहीं होता

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता को लगी चोट साधारण थी या शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से पर नहीं थी, इसका पॉक्सो की धारा आठ के आरोप पर निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ता।

शारीरिक चोट इस अपराध का आवश्यक तत्व नहीं है। इसलिए चोट की प्रकृति को आधार बनाकर जमानत के स्तर पर पॉक्सो आरोप को कमजोर मानना उचित नहीं था।

चारों के बेल बॉन्ड निरस्त, दो सप्ताह में सरेंडर का आदेश

हाईकोर्ट ने 19 जुलाई 2025 को दिए गए नियमित जमानत आदेश को रद करते हुए चारों आरोपितों के बेल बॉन्ड भी निरस्त कर दिए।

उन्हें दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि आत्मसमर्पण के बाद वे नए सिरे से नियमित जमानत की मांग कर सकते हैं। ऐसी अर्जी पर पीड़िता की मां को नोटिस देकर उचित अवसर देना होगा।

पॉक्सो मामलों में सतर्कता बरतने की हिदायत

हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश को भविष्य में पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में अधिक सतर्क रहने की अपेक्षा जताई। अदालत के फैसले ने स्पष्ट किया कि जमानत के स्तर पर निचली अदालत को उपलब्ध सामग्री पर स्वतंत्र और न्यायिक रूप से विचार करना होगा।

महज आत्मसमर्पण या अभियोजन की सहमति के आधार पर पहले दिए गए न्यायिक निष्कर्ष को बदलना उचित नहीं है।

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