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उत्तर प्रदेश

प्रेमानंद महाराज के शिष्य रसिक दुलारी ने क्यों छोड़ दिया था अपना घर? वृंदावन आते ही दीपक लोधी के साथ क्या-क्या हुआ

वृंदावन के प्रसिद्ध राधा केली कुंज आश्रम से जुड़े साधक रसिक दुलारी शरण की संदिग्ध मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं. रसिक दुलारी शरण का मूल नाम दीपक लोधी था और उनकी उम्र 29 साल थी. लेकिन उनकी मौत से जुड़े सवालों के बीच यह जानना भी अहम है कि आखिर दीपक लोधी कौन थे और उन्होंने अपना घर क्यों छोड़ा? उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दीपक एक साधारण किसान परिवार से आते थे. खेती-किसानी, पढ़ाई और मां नर्मदा की भक्ति के बीच उनका झुकाव धीरे-धीरे आध्यात्म की तरफ बढ़ता गया और यही उन्हें वृंदावन तक ले आया.

जबलपुर के मगरदा गांव से था नाता

दीपक लोधी जबलपुर के डोब क्षेत्र, बरगी डैम के मगरदा गांव के रहने वाले थे. हालांकि, पिछले करीब 10 साल से वह जमतरा परसवाड़ा में अपने ननिहाल में रह रहे थे. परिवार में उनके छोटे भाई के भारत पेट्रोलियम में काम करने की जानकारी दी गई है. परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा था और दीपक भी पिता के साथ खेती किया करते थे. यानी उनका शुरुआती जीवन किसी साधारण ग्रामीण परिवार के युवक की तरह ही रहा. करीबी लोगों के मुताबिक दीपक मिलनसार स्वभाव के थे और सबके साथ अच्छा व्यवहार करते थे. उन्हें शांत और पढ़ा-लिखा युवक बताया जाता है.

जबलपुर से ग्रेजुएशन किया था

दीपक ने जबलपुर से ग्रेजुएशन किया था. पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उनका झुकाव आध्यात्म की तरफ बना रहा. करीबियों से मिली जानकारी के मुताबिक, वह मां नर्मदा के बड़े भक्त थे. उनका आध्यात्म से जुड़ाव आगे चलकर और गहरा हुआ. करीब ढाई साल पहले उन्होंने जबलपुर के संत दादा गुरु भैया जी सरकार के साथ छह महीने की पदयात्रा भी की थी. इस यात्रा के बाद उनकी जिंदगी की दिशा और स्पष्ट होती गई. वह सामान्य पारिवारिक जीवन से अलग आध्यात्मिक रास्ते की ओर बढ़ने लगे.

छह महीने की पदयात्रा के बाद आया बड़ा मोड़

छह महीने की पदयात्रा पूरी करने के बाद दीपक घर लौटे थे. इसके बाद जब परिवार की ओर से शादी को लेकर दबाव बनाया गया तो उन्होंने वृंदावन जाने का फैसला किया. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उनके घर छोड़ने की वजह किसी पारिवारिक विवाद को नहीं बताया गया है. उनका झुकाव पहले से आध्यात्म की तरफ था और पदयात्रा के बाद यह जुड़ाव और बढ़ गया था. इसी दौरान उन्होंने घर-परिवार से दूर जाने का रास्ता चुना और वृंदावन पहुंच गए. यहीं से उनकी जिंदगी का अगला अध्याय शुरू हुआ.

प्रेमानंद महाराज से ली थी दीक्षा

वृंदावन पहुंचने के बाद दीपक लोधी ने संत प्रेमानंद महाराज से दीक्षा ली. इसके बाद वह रसिक दुलारी शरण के नाम से पहचाने जाने लगे. बताया गया है कि वह पिछले करीब दो साल से वृंदावन में रह रहे थे. यानी जिस युवक की जिंदगी खेती और परिवार के बीच गुजर रही थी, वह धीरे-धीरे आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ गया. परिवार की ओर से मिली जानकारी के अनुसार दीक्षा लेने के बाद दीपक की परिवार से बातचीत काफी कम हो गई थी और उनके बीच दूरी भी बढ़ती गई.

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