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मुजफ्फरपुर में प्राकृतिक खेती से किसानों को लागत में बड़ी बचत, मिट्टी भी हो रही मजबूत

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में प्रधानमंत्री प्राकृतिक खेती योजना के तहत जिले के 15 क्लस्टरों में 750 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा रही है।

प्रत्येक क्लस्टर में 50 हेक्टेयर भूमि चिह्नित कर 1875 किसानों को योजना से जोड़ा गया है। किसानों को रसायनमुक्त खेती के लिए प्रेरित करने के साथ उन्हें जैविक खाद व प्राकृतिक घोल तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

क्लस्टर से जुड़े मड़वन प्रखंड के बगाही गांव के किसान लगनदेव राय ने बताया वह पिछले 15 वर्षों से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। सरकार की ओर से पिछले वर्ष इसका क्लस्टर बनाने के बाद किसानों में रुचि बढ़ी है। उन्होंने एक एकड़ में धान की खेती की।

प्राकृतिक विधि से खेती करने में मात्र 400 से 500 रुपये तक खर्च आया, जबकि रासायनिक खेती करने वाले किसानों को तीन से पांच हजार रुपये तक खर्च करने पड़े।

वहीं प्राकृतिक खेती में प्रति कट्ठा 50 से 60 किलो धान की उपज हुई, जबकि रासायनिक खेती में 70 से 90 किलो तक उत्पादन मिला। प्राकृतिक खेती में खेतों में घास कम उगती है और मिट्टी की ताकत धीरे-धीरे बढ़ती है।

सकरा प्रखंड के गनी बेझा गांव के किसान रामनंदन प्रसाद ने बताया वह पहले से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं और अब सरकारी क्लस्टर योजना से भी जुड़े हैं।

बताया कि इस बार गेहूं की खेती में बेहतर परिणाम मिले। रासायनिक विधि से एक एकड़ में 20 से 22 क्विंटल गेहूं उत्पादन होता है, जबकि प्राकृतिक खेती में 16 से 18 क्विंटल हुआ। लागत में बड़ा अंतर देखने को मिला।

रासायनिक खेती में जुताई से कटाई तक 20 से 22 हजार रुपये खर्च होते हैं, जबकि प्राकृतिक खेती में यही खर्च 14 से 15 हजार रुपये तक है। प्राकृतिक खेती में शुरुआती तीन वर्षों में कुछ परेशानी होती है, लेकिन बाद में उत्पादन भी बेहतर होने लगता है।

बकटपुर कांटी के अरविंद मिश्रा ने कहा प्राकृतिक खेती के लिए विभाग की ओर से बायो रिसोर्स सेंटर के रूप में चयनित किया गया है। अभी उनके केंद्र से 150 किसान जुड़े हैं।

किसानों को जीवामृत, घनजीवामृत व अन्य प्राकृतिक खाद तैयार करने की जानकारी के साथ उनको उपलब्ध कराया जा रहा है। योजना के नोडल पदाधिकारी सहायक निदेशक रसायन कुणाल सिंह ने बताया प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को लगातार जागरूक किया जा रहा है। इस खेती से लागत कम होने के साथ मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी मजबूत हो रही है।

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