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एक शिवलिंग में समाए शिव-विष्णु-शक्ति-सूर्य, विदिशा में मिली गुप्तकालीन मूर्ति ने खोला सनातन की एकता का राज

उज्जैन के पुरातत्व संग्रहालय में वर्ष 2016 से सुरक्षित एक प्राचीन मूर्ति ने भारतीय धार्मिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी की ओर विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। विदिशा जिले के बड़ोह से मिली गुप्तकालीन इस मूर्ति में एक ही शिवलिंग के स्वरूप में ब्रह्मा, विष्णु, शक्ति और सूर्य को स्थान दिया गया है। पुराविदों के अनुसार, यह मध्य प्रदेश में मिली अब तक की ऐसी पहली मूर्ति है, जिसमें शैव, वैष्णव, शाक्त और शौर्य यानी सूर्य उपासना परंपराओं के आराध्यों को एक साथ प्रदर्शित किया गया है।

पुरातत्व और मूर्तिशास्त्र के विशेषज्ञों ने इसी माह मूर्ति की संरचना और प्रतीकों का अध्ययन किया। इसके बाद संभावना जताई गई कि पांचवीं शताब्दी के आसपास अलग-अलग वैदिक सनातन संप्रदायों के बीच बढ़ते मतभेदों को कम करने और एकता का संदेश देने के उद्देश्य से ऐसी प्रतिमाओं की रचना की गई होगी।

अलग-अलग आराध्य, लेकिन सनातन एक
मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के पुराविद डा. रमेश यादव के मुताबिक, गुप्तकाल के आसपास शैव, वैष्णव, शाक्त और सूर्य उपासना जैसी परंपराओं का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में था। उस दौर में शासक भी अपने-अपने इष्ट और संप्रदायों को संरक्षण देते थे। इससे कई बार धार्मिक मतभेद टकराव का रूप ले लेते थे।

ऐसे समय में विभिन्न देव परंपराओं को एक प्रतीक में समाहित करने वाली मूर्तियों के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि आराधना की पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन सनातन परंपरा की मूल भावना एक है। माना जाता है कि इसके बाद विभिन्न देव परंपराओं को राजकीय स्तर पर भी समान महत्व मिलने लगा।

120 सेंटीमीटर की मूर्ति में कई परंपराओं का समावेश

गुप्तकाल, यानी लगभग पांचवीं शताब्दी की मानी जा रही यह मूर्ति 120×37×38 सेंटीमीटर आकार की है। इसका मूल आधार शिवलिंग है, जो शैव परंपरा का प्रमुख प्रतीक है। मूर्ति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ शक्ति और सूर्य को भी समाहित किया गया है।

डा. रमेश यादव के अनुसार, गुप्तकाल को सनातन परंपरा के पुनरोत्थान का महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था। वहीं, वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान के शोध अधिकारी डा. ध्रुवेन्द्र जोधा के अनुसार, इस प्रतिमा में शक्ति का समावेश इसे और भी दुर्लभ बनाता है।

1800 साल पुरानी सरस्वती प्रतिमा ने बदली संगीत इतिहास की तस्वीर

उज्जैन संग्रहालय में संरक्षित एक अन्य प्राचीन प्रतिमा भी पुरातत्वविदों के लिए शोध का नया विषय बन गई है। देवी सरस्वती की यह प्रतिमा दूसरी शताब्दी की बताई जा रही है और इसकी आयु करीब 1800 वर्ष मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मध्य प्रदेश में अब तक प्राप्त सरस्वती की सबसे प्राचीन प्रतिमाओं में शामिल है।

इस प्रतिमा की सबसे खास बात इसके हाथों में दिखाई गई वक्र वीणा यानी आर्च्ड हार्प है। पुराविदों के अनुसार, यह अब तक सामने आई सरस्वती की प्रतिमाओं में वक्र वीणा के स्पष्ट चित्रण का दुर्लभ उदाहरण है। इससे न केवल देवी सरस्वती के प्राचीन स्वरूप की जानकारी मिलती है, बल्कि उस दौर में भारतीय संगीत में इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्रों पर भी नई रोशनी पड़ती है।

प्रतिमा में वीणा का घुमावदार ढांचा, गोलाकार ध्वनि-पेटी और तार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे संकेत मिलता है कि दूसरी शताब्दी के आसपास भारतीय संगीत परंपरा में आर्च्ड हार्प का महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा।

समुद्रगुप्त के सिक्कों में भी दिखता है हार्प

पुरातत्वविदों के तुलनात्मक अध्ययन में सामने आया कि बौद्ध, मथुरा और गुप्तकालीन कला में हार्प के प्रमाण मिलते हैं। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के लगभग 335 से 380 ईस्वी के स्वर्ण सिक्कों पर भी उन्हें घुमावदार हार्प बजाते हुए दर्शाया गया है।

हालांकि, छठी से 10वीं शताब्दी के बीच भारतीय कला और शास्त्रीय संगीत परंपरा में आर्च्ड हार्प का प्रयोग धीरे-धीरे कम हुआ और लंबी गर्दन वाली वीणा का महत्व बढ़ता गया।

विशेषज्ञों ने शुरू किया तुलनात्मक अध्ययन

पुरातत्व एवं अभिलेखागार आयुक्त मदन कुमार नागरगोजे ने हाल में उज्जैन संग्रहालय का भ्रमण किया था। इसी दौरान उन्होंने पुराविदों को सरस्वती की इस प्रतिमा के साथ मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों से प्राप्त सरस्वती प्रतिमाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के निर्देश दिए।

इसके बाद पुराविद डा. रमेश यादव और संग्रहालय के क्यूरेटर योगेश पाल ने वेदों तथा विभिन्न धर्मग्रंथों के संदर्भों का अध्ययन किया। शोध में सामने आया कि वक्र वीणा के स्वरूप वाली यह प्रतिमा भारतीय संगीत और देवी सरस्वती के ऐतिहासिक स्वरूप को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

दोनों प्राचीन प्रतिमाएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि उज्जैन का संग्रहालय केवल पुरातात्विक वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक, सांस्कृतिक और संगीत परंपराओं के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत भी है।

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