उत्तराखंड
उत्तराखंड के जिम संचालक दीपक कुमार के खिलाफ एफआईआर की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कोटद्वार जिम संचालक दीपक कुमार के खिलाफ उत्तराखंड में दर्ज प्राथमिकी पर सुनवाई पर रोक लगा दी, जो जनवरी में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ अपने आमना-मोचे का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद ‘मोहम्मद दीपक’ के रूप में सुर्खियों में आए थे।
दीपक के खिलाफ प्राथमिकी तब दर्ज की गई थी जब उन्होंने कोटद्वार में बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं से पूछताछ की थी, जिसमें उन्होंने एक मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद द्वारा अपनी दुकान का नाम ‘बाबा’ रखने पर आपत्ति जताई थी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तराखंड सरकार और अन्य से उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 20 मार्च के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें पुलिस सुरक्षा की मांग करने और ‘पक्षपातपूर्ण’ आचरण के लिए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने सभी पक्षों को निर्देश दिया था कि वे सोशल मीडिया पर घटना से संबंधित कोई टिप्पणी न करें ताकि जन भावनाएं भड़कने वाली न हों।
उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए अदालत ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की।
दीपक की ओर से वरिष्ठ वकील एएम सिंघवी ने कहा, ‘एक अच्छे व्यक्ति को इस तरह की शिकायत कैसे दी जा सकती है?’
दीपक ने उच्च न्यायालय से अनुरोध किया था कि वह उन्हें और उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने में कथित पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच का आदेश दे।
हालांकि, राज्य सरकार ने दीपक पर 13 मार्च तक पुलिस सुरक्षा सहित महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया और उनकी शिकायत पर दो प्राथमिकी दर्ज की गईं। हाईकोर्ट को बताया गया कि दीपक को किसी तरह की धमकी का सामना नहीं करना पड़ा।
कोटद्वार पुलिस ने इस मामले में तीन अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं।
दुकानदार के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल 30-40 अज्ञात लोगों के खिलाफ सार्वजनिक शांति भंग करने, सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिस अधिकारियों के साथ हाथापाई करने के लिए पहला मामला दर्ज किया गया था।
दीपक ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर शांति भंग करने के इरादे से कथित दंगा करने, चोट पहुंचाने और जानबूझकर अपमान करने के लिए उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की थी। वह कथित नफरत भरे भाषण के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने, अपने और अपने परिवार के लिए पुलिस सुरक्षा और कथित पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच चाहते थे।
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