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बिहार-झारखंड

100 घरों के गांव से सेना में जाने वाली पहली बेटी, गयाजी के डुमरिया गांव की पिंकी बनीं BSF जवान

 कभी नक्सली गतिविधियों के लिए पहचाने जाने वाले जिले के सुदूरवर्ती महुराव गांव की एक बेटी ने अपनी मेहनत और हौसले से नई पहचान बनाई है।

जंगल-पहाड़ों से घिरे डुमरिया प्रखंड की छकरबंधा पंचायत स्थित इस गांव की पिंकी कुमारी सीमा सुरक्षा बल में जवान बनकर देश की सेवा कर रही हैं।

वर्तमान में उनकी तैनाती पंजाब के फिरोजपुर में है। करीब 100 घरों की आबादी वाले इस गांव से सरकारी सुरक्षा बल में नौकरी पाने वाली वह पहली बेटी हैं।

पिंकी की सफलता इसलिए भी खास है कि उन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच अपने सपने को साकार किया। गांव से लगभग 15 किलोमीटर दूर विद्यालय तक प्रतिदिन साइकिल चलाकर पढ़ाई करने जाती थीं।

बचपन से ही पुलिस की वर्दी पहनकर देश की सेवा करने का सपना देखने वाली पिंकी ने अपनी मेहनत से इसे हकीकत में बदल दिया।

पिता सत्येंद्र साव और माता मालती देवी ने बताया कि उनकी तीन बेटियां हैं। दो बेटियों की शादी हो चुकी है। तीसरी बेटी पिंकी ने बचपन से ही पढ़ाई और अपने लक्ष्य के प्रति गंभीरता दिखाई।

परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। खेती-किसानी से घर चलता था, लेकिन पिता ने बेटी के सपने को पूरा करने में कोई कमी नहीं रखी।

साइकिल से तय करती थीं 15 किलोमीटर का सफर

पिंकी की प्रारंभिक पढ़ाई मध्य विद्यालय छकरबंधा में पहली से आठवीं कक्षा तक हुई। इसके बाद नौवीं और दसवीं की पढ़ाई प्लस टू उच्च विद्यालय मैगरा से पूरी की।

गांव से विद्यालय की दूरी करीब 15 किलोमीटर थी। वह प्रतिदिन साइकिल से इतनी लंबी दूरी तय कर पढ़ने जाती थीं। वर्ष 2018 में मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने सीमा सुरक्षा बल में भर्ती होने की तैयारी शुरू कर दी।

आखिरकार वर्ष 2023 में उनका चयन बीएसएफ में हो गया। पिंकी बताती हैं कि बचपन से उनका एक ही लक्ष्य था कि खाकी वर्दी पहनकर देश की सेवा करें। कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं बदला। आज वह सीमा पर अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं।

बेटी की सफलता से गांव में बदली सोच

महुराव गांव और आसपास के इलाके में पिंकी की सफलता को बदलाव की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। ग्रामीण अजय साव बताते हैं कि करीब दो दशक पहले तक इस देहाती इलाके में बेटियों की पढ़ाई को लेकर परिवारों में उतनी जागरूकता नहीं थी।

कई परिवार बेटियों को आगे पढ़ाने में रुचि नहीं लेते थे। लेकिन अब समय के साथ सोच बदल रही है। पिंकी की उपलब्धि के बाद गांव की दूसरी बेटियां भी पढ़ाई को लेकर गंभीर हुई हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि उनकी सफलता ने साबित कर दिया है कि कठिन परिस्थितियां किसी के सपनों की राह नहीं रोक सकतीं।

जिस गांव की पहचान कभी नक्सली गतिविधियों से जुड़ी थी, आज उसी गांव की बेटी देश की सीमा की सुरक्षा में तैनात होकर नई पीढ़ी को शिक्षा, मेहनत और आत्मविश्वास का संदेश दे रही है।

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