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फर्जी डिग्री रैकेट पर ऑस्ट्रेलिया में हंगामा, भारतीय कार्रवाई का हवाला देकर सीनेटर मैल्कम रॉबर्ट्स ने छात्र वीज़ा सिस्टम पर उठाए सवाल

ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड से सीनेटर Malcolm Roberts ने भारत में सामने आए बड़े फर्जी डिग्री घोटाले का हवाला देते हुए ऑस्ट्रेलिया की छात्र वीज़ा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सीनेटर रॉबर्ट्स, जो Pauline Hanson’s One Nation पार्टी से जुड़े हैं, ने दावा किया कि इसी तरह की शैक्षणिक धोखाधड़ी ऑस्ट्रेलिया में भी हो चुकी है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय पुलिस ने 22 विश्वविद्यालयों से जुड़ी लगभग 1 लाख नकली डिग्रियां जब्त की हैं। जांच एजेंसियों का अनुमान है कि देशभर में 10 लाख से अधिक फर्जी प्रमाणपत्र पहले ही प्रचलन में हो सकते हैं, जिनका इस्तेमाल विदेशों में नौकरी पाने के लिए किया गया।

सीनेटर रॉबर्ट्स ने आरोप लगाया कि उन्होंने अगस्त और अक्टूबर में संसदीय अनुमानों (Estimates) के दौरान यह मुद्दा उठाया था। उनका दावा है कि ऑस्ट्रेलिया में करीब 23,000 विदेशी छात्रों के पास “खरीदी हुई” डिग्रियां पाई गईं, खासकर एज्ड केयर और अर्ली चाइल्डहुड सेक्टर में। उन्होंने Albanese Government पर आरोप लगाया कि स्पष्ट वीज़ा उल्लंघनों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

रॉबर्ट्स ने कहा कि जब उन्होंने रोजगार मंत्री Murray Watt से फर्जीवाड़े में शामिल लोगों के निर्वासन (deportation) को लेकर सवाल किया, तो उन्हें “टालमटोल और गुमराह करने वाले जवाब” मिले।

यह बयान भारत के केरल में सामने आए एक बड़े पुलिस अभियान के बाद आया है, जहां Kerala Police ने नकली विश्वविद्यालय डिग्रियों के एक विशाल नेटवर्क का भंडाफोड़ किया। इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 1 लाख से अधिक फर्जी प्रमाणपत्र जब्त किए गए। पुलिस का कहना है कि यह बरामदगी पूरे नेटवर्क का सिर्फ एक छोटा हिस्सा हो सकती है।

जांच में सामने आया कि यह गिरोह मेडिकल, नर्सिंग और इंजीनियरिंग जैसे उच्च जोखिम वाले पेशों की फर्जी डिग्रियां तैयार कर रहा था, जिनका इस्तेमाल सरकारी और निजी नौकरियों में अवैध रूप से भर्ती के लिए किया गया। जांचकर्ताओं के अनुसार, इस रैकेट के जरिए देशभर में 10 लाख से अधिक लोगों को प्रमाणपत्र जारी किए गए, जिससे भर्ती प्रणाली और सार्वजनिक सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हुआ।

प्रत्येक नकली डिग्री 1,350 से 2,700 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में बेची जाती थी, जबकि कुछ मामलों में कीमत 3,600 से 7,300 डॉलर तक वसूली गई। इससे करोड़ों रुपये का अवैध मुनाफा कमाया गया।

भारतीय मीडिया के अनुसार, इस घोटाले का मुख्य आरोपी धनीश उर्फ “डैनी” है, जिसे 2013 में भी गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसने तमिलनाडु से दोबारा नेटवर्क खड़ा किया और शिवकाशी के अनुभवी प्रिंटर्स व कई राज्यों में फैले एजेंटों की मदद ली।

जांच के दौरान मलप्पुरम जिले में संदिग्धों को हिरासत में लिया गया, जहां केरल और बेंगलुरु के विश्वविद्यालयों के नाम से फर्जी डिग्रियां बरामद हुईं। इसके बाद विरुधुनगर जिले के शिवकाशी में तीन लोगों को गिरफ्तार कर कंप्यूटर, नकली सील और प्रमाणपत्र जब्त किए गए। सभी आरोपियों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर आगे की जांच के लिए रिमांड पर भेज दिया गया।

पुलिस ने कई जगहों से प्रिंटर, होलोग्राम सील और विश्वविद्यालयों की नकली मुहरें भी बरामद की हैं। यह भी जांच की जा रही है कि क्या किसी विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने टेम्पलेट या गोपनीय जानकारी देकर इस घोटाले में मदद की। जब्त फर्जी डिग्रियों को सत्यापन के लिए संबंधित विश्वविद्यालयों को भेजा जाएगा और उन लोगों की पहचान की जा रही है जिन्होंने इन दस्तावेज़ों के जरिए नौकरी हासिल की।

सीनेटर रॉबर्ट्स ने कहा कि भारत में हुई यह कार्रवाई ऑस्ट्रेलिया के लिए चेतावनी है और अकादमिक धोखाधड़ी से सार्वजनिक सुरक्षा और सिस्टम की विश्वसनीयता को गंभीर खतरा है। हालांकि, ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने अभी तक उनके ताज़ा आरोपों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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