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मध्य प्रदेश

झूठे सामूहिक दुष्कर्म केस की भारी कीमत: धार की महिला को तीन साल की जेल, कोर्ट ने कहा- न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं

मध्य प्रदेश के धार जिले में न्यायालय ने झूठे सामूहिक दुष्कर्म के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक महिला को तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने माना कि महिला ने गंभीर आरोप लगाकर न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह किया और छह लोगों को अनावश्यक रूप से कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

धरमपुरी न्यायालय के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी विवेक जैन ने 38 वर्षीय आयशा बी को भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में अतिरिक्त 30 दिन का कारावास भुगतना होगा।

2018 में दर्ज कराया था केस

मामला वर्ष 2018 का है, जब आयशा बी ने थाना धरमपुरी में छह लोगों के खिलाफ घर में घुसकर सामूहिक दुष्कर्म करने और जान से मारने की धमकी देने की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

इसके बाद महिला ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत भी अपने आरोपों की पुष्टि की। हालांकि, जब मामला अपर सत्र न्यायालय में विचाराधीन हुआ तो सुनवाई के दौरान महिला अपने पूर्व बयानों से मुकर गई।

गवाही के दौरान उसने अदालत को बताया कि वह आरोपितों को पहचानती नहीं है और उसने जो आरोप लगाए थे, वे उसके पति के दबाव में लगाए गए थे। महिला ने यह भी दावा किया कि पहले दिए गए बयान उसकी स्वतंत्र इच्छा से नहीं थे।

अदालत ने कहा- न्यायिक प्रक्रिया को किया प्रभावित

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि महिला ने अलग-अलग स्तरों पर एक जैसे बयान दिए और बाद में उनसे पलट गई। इससे स्पष्ट होता है कि उसने न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और अदालत को भ्रमित करने का प्रयास किया।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि गंभीर अपराध के आरोप लगाकर छह लोगों को जेल भिजवाना और बाद में बयान बदल देना न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और शुचिता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऐसे मामलों में कठोर संदेश देना आवश्यक है।

परिवीक्षा का लाभ भी नहीं मिला

अदालत ने महिला को परिवीक्षा (प्रोबेशन) का लाभ देने से भी इंकार कर दिया। न्यायालय का मानना था कि मामले की गंभीरता को देखते हुए केवल चेतावनी या राहत पर्याप्त नहीं होगी और दोषी को निर्धारित सजा भुगतनी होगी।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

धारा 193 आईपीसी झूठी गवाही देने और झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने से संबंधित है। इस अपराध में अधिकतम सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग और झूठे मामलों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है।

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