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15 साल की मेहनत और इंजीनियरिंग का कमाल, एमपी में भारत की सबसे लंबी वाटर टनल बनकर तैयार
नर्मदा नदी के जल को सोन बेसिन तक ले जाने वाला प्रोजेक्ट अब पूरा होता नजर आ रहा है। कटनी जिले के स्लीमनाबाद में विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच से करीब 12 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग बनाई गई है।
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NBDA) के मुताबिक 14 जुलाई तक सुरंग निर्माण में लगी टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) सीमेंटेड कुएं तक पहुंच गई। इसके बाद नर्मदा नदी के जल को आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया।
कुएं से सिर्फ अब बोरिंग मशीनों को बाहर निकालने का काम रह गया है। एनबीडीए के एसडीओ दीपक मंडलोई ने बताया कि करीब डेढ़ महीने में कुएं से मशीनों को बाहर निकालने का काम पूरा हो जाएगा। इसके बाद नहर में पानी छोड़ा जाएगा।
आखिरकार मिल रहे नर्मदा और सोनभद्र
लोककथाओं में एक कहानी बहुत प्रचलित है। मैकल पहाड़ियों की बेटी नर्मदा का विवाह सोनभद्र से होना तय हो चुका था।
नर्मदा की एक सखी थी, उसका नाम जुहिला था। शादी से पहले नर्मदा ने अपनी सखी जुहिला को सोनभद्र से मिलने भेजा, जिससे वो सोनभद्र के बारे में आकर उसे बता सके, लेकिन सोनभद्र ने जुहिला को ही नर्मदा समझ लिया।
नर्मदा को जब ये बात पता चली तो उनका दिल टूट गया और वे अपमानित और क्रोधित होकर पश्चिम की ओर मुड़ गईं। सोनभद्र ने नर्मदा का पीछा करने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो गई थी।
देखा जाए तो नर्मदा जहां पश्चिम की ओर मुड़ गईं, वहीं सोनभद्र पूर्व की ओर चला गया। कहा जाए तो मैकल पहाड़ियों में जो कहानी शुरू हुई वह कभी पूरी नहीं हुई।
एक ही पर्वत से निकलने वाले नर्मदा और सोनभद्र विपरीत दिशाओं में बह रहे हैं। उनके बीच विंध्य की चट्टानी चोटियां हैं। वहीं अब सदियों बाद मानव ने पहाड़ के बीच से रास्ता बनाया है और रूठी हुई नर्मदा को सोनभद्र से मिलाया है।
पहाड़ों को चीरकर बनाई गई सुरंग
नर्मदा नदी परियोजना का ये काम साल 2011 में शुरू हुआ था। सलैया फाटक से खिरहनी गांव तक पहाड़ों को चीरकर बनाई गई सुरंग के डाउन स्ट्रीम का कार्य पहले ही पूरा हो चुका था।
अप स्ट्रीम का काम साल 2025 के अंत तक पूरा होना था, लेकिन समय-सीमा बढ़ाई गई और अब इस साल इस परियोजना का काम पूरा हो गया है।
NBDA के एसडीओ दीपक मंडलोई ने बताया, ‘नर्मदा दायीं तट नहर परियोजना में स्लीमनाबाद के पास बनाई जा रही टनल का कार्य लगभग पूर्ण हो गया है। सोमवार को सिर्फ छह मीटर का कार्य शेष था और मंगलवार तक उसको पूरा कर दिया गया।’
दीपक मंडलोई ने आगे बताया, ‘इसके बाद अब मशीन बनाए गए कुएं तक पहुंचेंगी और उनको खोलकर बाहर निकालने का कार्य शुरू किया जाएगा। वर्षों से नर्मदा जल को आगे तक पहुंचाने का काम मार्ग टनल निर्माण के साथ ही पूरा हो जाएगा।
अमेरिका और जर्मनी से मंगाई गई अत्याधुनिक मशीनों को बाहर निकालने के लिए एनबीडीए ने 100 फीट गहरा सीमेंटेड कुआं तैयार कराया है। मशीनों को खोलकर उनके कल-पुर्जे क्रेन की मदद से बाहर निकाले जाएंगे। सुरंग में बिछाई गई पटरी और अन्य सामग्री भी हटाई जाएगी।
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1500 करोड़ की लागत से बनी सुरंग
2011 में जब ये परियोजना शुरू की गई थी, तब इसकी लागत 799 करोड़ रुपये तय हुई थी, लेकिन परियोजना का काम आगे बढ़ने के साथ ही लागत 1500 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
भारत की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग का निर्माण पूरा हो गया है, जिसकी लंबाई 11.952 किलोमीटर और व्यास 10.14 मीटर है। एक बार इसके माध्यम से पानी छोड़े जाने के बाद, सुरंग पंपों की सहायता के बिना, प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण प्रवाह द्वारा नर्मदा का पानी ले जाएगी।
इंजीनियरिंग का कमाल
यह एक आधुनिक इंजीनियरिंग परियोजना थी, जिसे बनाने में इंजीनियर्स के सामने कई कठिनाई आई, लेकिन आखिरकार उन्हें सफलता मिल ही गई।
इंजीनियर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि एक तरफ पहाड़ खड़ा था। दूसरी ओर खेत पानी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके बीच इंजीनियर और कर्मचारी थे जिन्हें नदी के लिए रास्ता खोलने का काम सौंपा गया था।
इस सुरंग को बनाने में इंजीनियर्स को सिंकहोल्स, वायु हानि और द्रवीकरण के खतरे का सामना करना पड़ा। गिरते मलबे, अत्यधिक कठोर चट्टान, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और सुरंग बोरिंग मशीनों के कटर हेड्स को बार-बार होने वाली क्षति ने खुदाई को और भी कठिन बना दिया।
नर्मदा को सोनभद्र तक पहुंचाना आसान नहीं था। इस प्रोजेक्ट के दौरान ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सोनभद्र की भूमि की ओर बढ़ने से पहले, नर्मदा को विंध्य पर्वत श्रृंखला पार करने के लिए रास्ते में आने वाली हर बाधा का सामना करने के लिए तैयार किया जा रहा था।
यह सुरंग नर्मदा का पानी ले जाने के लिए बनाई जा रही थी, लेकिन भूजल बार-बार मजदूरों को रोकता रहा। पंपों को लगातार चलाना पड़ा। इंजीनियरों ने हर नई चट्टान के निर्माण का अध्ययन किया। श्रमिकों ने पानी निकाला, मलबा साफ किया और मशीनों को आगे बढ़ने के लिए जमीन तैयार की।
सुरंग के अंदर न तो सूर्योदय होता था और न ही सूर्यास्त। समय को सिर्फ घड़ियों से मापा जा रहा था। मशीनों से हवा की गुणवत्ता की जांच की गई।
पहाड़ के अंदर कई किलोमीटर तक काम करने वाले श्रमिकों के लिए आसमान केवल उनकी शिफ्ट के अंत में बाहर निकलने के बाद ही दिखाई देता था।
सुरंग को बनाने में आई सभी मुश्किलों के बाद इंजीनियर्स से लेकर मजदूरों तक की मेहनत नजर आ रही है, क्योंकि पहाड़ के बीच से रास्ता बनाकर नर्मदा के जल को सोनभद्र तक पहुंचाना आसान नहीं था।
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