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हरियाणा

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक घोटाले में सीबीआई अदालत ने हरियाणा लेबर बोर्ड के क्लर्क को जमानत देने से इनकार किया

महज 50,000 रुपये के कथित भुगतान के लिए हरियाणा श्रम कल्याण बोर्ड (एचएलडब्ल्यूबी) के एक अनुबंधित लेखा क्लर्क ने कथित तौर पर सरकारी कोष से 50 करोड़ रुपये के गबन में मदद की। पंचकूला में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने उन्हें नियमित जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि जांच प्रथम दृष्टया कथित साजिश में उनकी सक्रिय संलिप्तता की ओर इशारा करती है।

यह गबन 657 करोड़ रुपये के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक-एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक घोटाले का हिस्सा है।

सीबीआई के अनुसार, बचत खाता खोलने की कोई मंजूरी नहीं होने के बावजूद, एक सह-आरोपी के निर्देश पर खाता क्लर्क अमित कुमार ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में इसे खोलने की सुविधा प्रदान की। एजेंसी ने कहा कि वह अच्छी तरह से जानते थे कि एफडीआर के निर्माण के लिए बचत खाते की आवश्यकता नहीं है।

उसने कथित तौर पर व्हाट्सएप के माध्यम से आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार को खाता खोलने के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का मोबाइल नंबर और तस्वीर प्रदान की।

सीबीआई ने अदालत के समक्ष कहा, ‘मोबाइल नंबर सह-आरोपी अभिषेक सिंगला (अभय कुमार के बहनोई) के नाम पर था और बोर्ड के साथ कॉलबैक और बैंक के संचार को छिपाने के लिए बोर्ड से मिलता-जुलता एक फर्जी ई-मेल बनाया गया था.’

यह भी पता चला कि 3 मार्च, 2025 को एक पत्र जारी किया गया था, जिसमें आईडीबीआई बैंक को 50 करोड़ रुपये हस्तांतरित करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें खाता संख्या खाली छोड़ दी गई थी। अकाउंट नंबर बाद में अभय कुमार ने 5 मार्च, 2025 को शाम 5:50 बजे व्हाट्सएप के माध्यम से प्रदान किया। यह पत्र 6 मार्च, 2025 को आईडीबीआई बैंक पहुंचा। सीबीआई ने कहा, ‘हालांकि बैच के अन्य पत्रों पर डिस्पैच क्लर्क द्वारा हाथ में डिस्पैच नंबर लिखा गया था, लेकिन इस पत्र पर ही वही छपा था, जिससे पता चलता है कि पत्र नंबर मिलने के बाद टाइप किया गया था.’

इस पत्र के आधार पर ही यह पैसा आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के खाते में ट्रांसफर किया गया था, जिससे करीब 15 दिनों के भीतर धोखाधड़ी से पैसे निकाल लिए गए थे।

अमित कुमार ने कथित तौर पर ई-मेल के माध्यम से बैंकों के साथ सभी संचार को संभाला, जबकि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के लिए, सभी संचार व्हाट्सएप के माध्यम से किए गए थे, और ई-मेल संचार को रिकॉर्ड से बाहर रखा गया था। उसने कथित तौर पर व्हाट्सएप के माध्यम से अभय कुमार से एक जाली ब्याज प्रमाण पत्र प्राप्त किया और बोर्ड के खाते में इसे असली के रूप में इस्तेमाल किया।

सीबीआई ने दावा किया कि 6 मई, 2025 को अमित कुमार को बैंक खाते में सटीक बैलेंस, एफडीआर की अनुपस्थिति और इस तथ्य के बारे में जानकारी मिली कि अभय कुमार बैंक के रोल में नहीं थे। इसके बावजूद, उन्होंने संचार में डायरी नंबर दर्ज नहीं किया, और इसे कभी भी कार्यालय की फाइल पर नहीं रखा गया था।

उन्होंने क्लर्क को निर्देश दिया था कि वह बैंक से आने वाले हर पत्र को वरिष्ठ अधिकारियों के ध्यान में लाने से पहले उसे दिखाए। जांच में अमित कुमार और अभय कुमार के बीच पत्र को लेकर हुई बातचीत का भी पता चला। सीबीआई ने कहा कि उनकी जानकारी के बावजूद, उन्होंने उच्च अधिकारियों को बचत खाता खोलने के बारे में नहीं बताया, और अपराध को छिपाने के लिए उनके और अभय कुमार के बीच व्हाट्सएप चैट को उनके फोन से हटा दिया गया था।

अभय कुमार के फोन से मिली चैट में अमित कुमार के खाते में 50,000 रुपये का नकद भुगतान दिखाया गया था।

अमित कुमार के वकील येवनीत ढाकला ने अदालत को बताया कि आरोपपत्र में उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर सामूहिक रूप से विचार करने पर भी आपराधिक मुकदमा चलाने का मामला नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि अमित कुमार की अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में सीमित भूमिका थी और उनके पास कोई भी निर्णय लेने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं था।

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की ओर से पेश वकील समीर सेठी ने सीबीआई की दलीलों को स्वीकार किया और जमानत याचिका खारिज करने का अनुरोध किया।

दलीलें सुनने के बाद सीबीआई के विशेष न्यायाधीश विजयंत सहगल ने शुक्रवार (30 अक्टूबर) को कहा, ‘तथ्यों और परिस्थितियों की समग्रता में, कथित अपराध की गंभीरता और परिमाण और आवेदक की विशिष्ट भूमिका पर विचार करते हुए, इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि आवेदक (अमित कुमार) नियमित जमानत की रियायत देने के लिए मामला बनाने में विफल रहा है। नतीजतन, वर्तमान आवेदन खारिज कर दिया जाता है।

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