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ग्वालियर से चेन्नई तक 1500 किमी की उड़ान, कबूतरों की इस अनूठी रेस ने खींचा देश का ध्यान
कबूतर रेसिंग का ग्वालियर नया ठिकाना बन रहा है। तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई की कई पिजन सोसायटी हर साल मई से जून माह के बीच कबूतर रेसिंग प्रतियोगिता का आयोजन करती हैं। नियम के तहत तमिलनाडु के अलग-अलग हिस्सों से कबूतरों को ग्वालियर लाकर छोड़ा जाता है और जो कबूतर सबसे पहले अपने मालिक के पास 1500 किमी दूर चेन्नई पहुंचता है, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है।
1460 किमी उड़ान भरकर जीती नेशनल लेवल रेस
गत छह मई को भी चेन्नई की रॉयल पिजन सोसायटी द्वारा ग्वालियर लाकर कबूतरों को छोड़ा गया था और विजेता एम. वेंकटेशन का कबूतर ग्वालियर से उड़ान भरने के बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक होते हुए तमिल नाडु के वेल्लोर जिले स्थित पल्लिकोंडा गांव में अपने घर सबसे पहले पहुंचा।
उसने करीब 99 घंटे (आठ दिन) में 1460 किमी की हवाई दूरी तय की। इस कबूतर ने नेशनल लेवल की लांग-डिस्टेंस रेस अपने नाम कर ली। अब आगामी कुछ महीनों के दौरान एक बार फिर ग्वालियर से कबूतर रेसिंग की प्रतियोगिता शुरू होंगी।
ग्वालियर, दिल्ली हैं आदर्श लॉचिंग हब
दक्षिण भारत (विशेषकर तमिल नाडु और कर्नाटक) की कबूतर सोसायटियों के लिए ग्वालियर और नई दिल्ली को आदर्श रिलीज प्वाइंट (कबूतरों को छोड़ने की जगह) माना जाता है। यहां से दक्षिण भारत की दूरी 1500 से 1800 किलोमीटर से अधिक बैठती है, जो इन पक्षियों की सहनशक्ति, दिशा ज्ञान और गति की वास्तविक परीक्षा लेती है।
कबूतरों को देते हैं विशेष प्रशिक्षण
इस प्रतियोगिता के लिए कबूतरों को विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया जाती है, ताकि वे बिना थके लंबी दूरी की उड़ान भर सकें और दिशा ज्ञान से वापस अपने घर पहुंच सकें। इस कबूतर रेसिंग प्रतियोगिता में तकनीक का भी उपयोग होता है। रिलीज प्वाइंट की जीपीएस लोकेशन से लेकर कबूतर के लौटने की जीपीएस लोकेशन को मैच करने के बाद ही विजेता घोषित किया जाता है।
50 से 60 कबूतरों में 8-10 ही लौटते हैं
दक्षिण में कबूतर रेसिंग प्रतियोगिता के लिए वर्षों तक कबूतर को पालकर व उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है। कबूतरों की खुराक से लेकर उनके प्रशिक्षण पर अच्छा पैसा खर्च किया जाता है। इसके बाद एक रेस में 50 से 60 कबूतरों को शामिल किया जाता है। उनके शरीर पर विशेष टैग लगाया जाता है, जिससे उनके मालिक व उनकी पहचान हो सके।
उन्हें सड़क मार्ग या ट्रेन के जरिए ग्वालियर लाकर 20 किमी बाहरी इलाके में ले जाया जाता है। वहां एक साथ कबूतरों को छोड़ा जाता है। विशेष बात ये है कि 50 में से सिर्फ आठ से 10 कबूतर ही वापस अपने मालिकों के पास चेन्नई पहुंच पाते हैं। बाकी कबूतर रास्ते में अनुकूल जगहों, जंगल या पानी की उपलब्धता देखकर वहीं बस जाते हैं।
पुरस्कार से अधिक प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता
चेन्नई की रॉयल पिजन सोसायटी के अध्यक्ष वी. मोहन कृष्णन के मुताबिक, कबूतर रेसिंग में विजेता के लिए पुरस्कार महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि ये प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता होती है। यही कारण है कि पुरस्कार के रूप में सिर्फ 50 ग्राम चांदी का सिक्का ही दिया जाता है, लेकिन जिसका कबूतर जीतता है उसे समाज में अच्छी प्रतिष्ठा मिलती है। वी. मोहन कृष्णन लंबे समय से अपने कबूतरों को इस रेस में उतार रहे हैं और अब तक उनके आठ कबूतर घर लौटे हैं, जो अभी तक के सर्वाधिक कबूतरों के लौटने का रिकॉर्ड है।
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